बुधवार, 13 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५९/६१

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५९/६१ 
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जाग्रत स्वप्न सुषोपती, इनितैं न्यारौ होइ । 
सुन्दर साक्षी तुरियतत, रूप आपनौ जोइ ॥५९॥
तब वह जीव जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं से आगे बढ़ कर तुरीयावस्था में पहुँच कर स्वकीय साक्षी रूप में पहुँच जाता है ॥५९॥
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तीन अवस्था जड कही, ये तौ है भ्रमकूप । 
सुन्दर आप बिचारि तूं, चेतनि तत्व स्वरूप ॥६०॥
श्रीसुन्दरदासजी उपदेश करते हैं - इन चार अवस्थाओं में जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - ये तीन अवस्था 'जड'(अचेतन) कहलाती है । इन को भ्रमजाल ही समझो । तुम तो तुरीयावस्था में पहुँच कर चेतन तत्त्व के साक्षात्कार हेतु एकान्ततः साधना करो ॥६०॥
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जाग्रत स्वप्न सुषोपती, तीनि अवस्था गौंन । 
सुन्दर तुरिय चढ्यौ जबहिं, खरी चढै तब कौंन ॥६१॥ 
इति सांख्य ज्ञान को अंग ॥२४॥
तुम जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं को गौण(मध्यम) ही समझो । अतः तुम तुरीयावस्था में पहुँच कर उसी के आधार पर साधना करो । यही तुम्हारे लिये शाश्वत आनन्दप्रदायिनी होगी । लोक में भी हम देखते हैं कि जो उत्तम घोड़े की सवारी का आनन्द अनुभव कर चुके हैं उनमें से कोई भी गधे की सवारी के लिये कभी अपनी उत्सुकता नहीं दिखाता ॥६१॥
इति साङ्ख्य ज्ञान का अंग सम्पन्न ॥२४॥
(क्रमशः) 

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