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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर ।*
*प्रेम भक्ति भावै नहीं, यहु मन का मत और ॥*
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*भक्तमहिमा ॥*
हरि कौं भजै सु हरि का होइ । नींच ऊँच अंतर नहिं कोइ ॥टेक॥
आसंक्या एक उपजी मनि आइ, अरजन कह्यौ किसन सौं जाइ ।
कोड़ि एक ब्रामण जगि मैं जींव्या, पूरयौ नहीं सु कौणैं भाइ ॥
किसन कहै सुणौं हो अरजन, बात कहँ एक ब्यौरि बिचारि ।
जिहि जेव्याँ जगि पूरौ होई, सो साध न जेव्याँ थाँकै द्वारि ॥
म्हे तौ पूजि पूजि पणि पूज्या, म्हे जाण्याँथे निर्मल भाइ ।
याँही थैं को निरमल छै, म्हे भूला थे देहु बताइ ॥
छै तौ साध पणि सुपच सरगरौ, अरजन त्याँह कै आप पधारि ।
उहि जेव्याँ जगि पूरौ होसी, बाजा बाजैं देव दुवारि ॥
अरजन भीम निकुल अरु सहदेव, राजा सहित पहूँता धाइ ।
साध सनमुखे ठाढे हूये, बालमीक के लागे पाइ ॥
पाँचौं पांडौं करैं बीनती, दीन बचन जोड़ै कर दोइ ।
दरस तुम्हारौ सबहीं पावैं, भवन हमारौ पावन होइ ॥
थे तौ ऊँच ऊँच कुल जनम्याँ, म्हे तौ नीच नीलकुल माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणौं, तौ हूँ थारै चालौं नांहि ॥
थे तौ साध सकल्ल सिरोमणि, थाँ समि तुल्लि और नहिं कोइ ।
थे हरि भगत हमारै आवो, थाँ आयाँ जगि पूरौ होइ ॥
बालमीक राजा कै आयौ, भोग लगाइ र लियौ अहार ।
जेता गास जेवताँ उठाया, संख बाजियौ तेती बार ॥
भूधर कहै हाथ तैं भजसी, रूडाँ काँइ न बाज्यौ मति कौ रुड़ ।
साध जेवताँ गासाँ बाग्यौ, कणि कणि काँइ न बाग्यौ कूड़ ॥
देव देव मोहि दोस न दीजै, दोस जको सो द्रोपति माहिं ।
नीच ऊँच की मन मैं आणी, ताथैं कणि बागौ नांहिं ॥
पारिख पड़ी पारख्या लाधी, जगि मैं न्यौंति जिमाया दोइ ।
जिहि जेव्याँ संख पँचाइण बाग्यौ, बषनां कहै सिरोमणि सोई ॥११९॥
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“मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥”
११|५५ गीता ॥
जो परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के परायण हो गया है, वह परमात्मा का अपना ही है । उसको अन्य का कहना उचित नहीं है । इन्हीं विचारों को इस पद में व्यक्त किया गया है । एक चौपाई प्रायः सुनने में आया करती है “ऊँच नीच जाणैं नहिं कोई । हरि कौं भजै सो हरि का होई ॥” संभवतः यह चौपाई बषनांजी के इस पद की टेक की ही छाया है ।
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गीता का ही एक अन्य श्लोक है जिसमें कहा गया है कि परमात्मा की भक्ति करने में न लिङ्गभेद, न वर्णभेद और न कर्मभेद ही आड़े आते हैं ।
“मां हि पार्थ व्यपाश्रित्ययेऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां – गतिम् ॥”
९|३२॥गीता॥
जो हरि को भजता है, वह हरि का हो जाता है । हरि की भक्ति करने में ऊँच और नीच का अंतर आड़े नहीं आता है ।
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अर्जुन ने कृष्ण से जाकर कहा, हे भगवन् ! मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई है । यज्ञ में एक करोड़ ब्राह्मणों ने भोजन किया है फिर भी यज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया है इसकी साक्ष्य भरने को शंख अभी तक बजा नहीं है । सो, न बजने का कारण क्या है । श्रीकृष्ण ने कहा, हे अर्जुन ! पूर्वापर बातों पर विचार करके मैं एक बात कहता हूँ । ध्यान देकर सुनो । जिसके जीमने से यज्ञ पूर्ण होगा वह ब्राह्मण = साधु अभी तक तुम्हारे द्वार पर आकर जींमा नहीं है ।
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इसपर अर्जुन बोला, अन्तर्यामिन् ! हमने तो प्रत्येक ब्राह्मण को पूजनीय, वंदनीय और शुद्धान्तकरण वाला जानकर, मानकर पूजा है और हमारी यह धारणा है कि ये भगवद्भजन आदि के द्वारा मल-विक्षेपादि समस्त दोषों से रहित शुद्धात्मा हैं । इनसे भी और अधिक कोई और निर्मल पवित्रात्मा है तो आप हमें उन्हें बता दें । हम भूल रहे हैं = हम नहीं जानते कि ऐसा कौन सा पवित्रात्मा जींमने से छूट गया है ।
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श्रीकृष्ण ने कहा, वह साधु तो है किन्तु है भंगी सरगरा । अर्जुन ! तुम स्वयं उसके घर उसको निमंत्रित करने जाओ । उसके जीमने के उपरान्त ही तुम्हारा यज्ञ पूरा होगा तथा यज्ञमंडप में, देवलोक में बाजा बजेगा = शंख ध्वनि करेगा । अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा राजा युधिष्ठिर सभी तत्काल उस भक्त के घर पहुँच गये । साधु के समक्ष = सेवा में पाँचों खड़े हो गये तथा वाल्मीकि नामक उस स्वपच भक्त के पैरों पड़कर वंदना करने लगे ।
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पाँचों पांडव दीन वचन युक्त वाक्यावली१ में वाल्मीकि से विनती करने लगे । भक्त-प्रवर ! आपका दर्शन करके हम सब तो कृतार्थ हो गये किन्तु यज्ञ में पधारे अन्य लोग भी आपके दर्शनों का लाभ ले सकें, एतदर्थ आप हमारे घर पर पधारें । हमारा घर भी पवित्र हो जायेगा । वाल्मीकि भक्त बोले, हे राजन् ! आप बड़े व्यक्ति हैं और उच्चकुल में जन्मे हैं । इसके विपरीत मैं बहुत ही छोटा व्यक्ति हूँ तथा नीच जाति में जन्मा हूँ । यदि आप ऊँच-नीच का विचार मन में रखते हों तो मैं आपके साथ आपके घर चलने को तैयार नहीं हूँ ।
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इस पर पांडवों ने निवेदन किया, आप सकल शिरोमणि साधु हैं, आपके समान और कोई महान् भक्त नहीं है ।
“संताँ कै कुल दीसै नांहीं । राम राम कह राम समांही ॥
ऊँच नीच कुल भेद बिचारै । सो तौं जनम आपणौं हारै ॥”
श्रीरामचरण वाणी ॥
हे हरिभक्त ! आप तो हमारे घर पर पधारो । आपके आने से ही हमारा यज्ञ पूरा होगा । वाल्मीकि राजा के यहाँ आया । भोजन सामने आने पर उसने उसे भगवान को अर्पण किया और भोजन करने लगा ।
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जितनी बार उसने जीमते हुए थाली में से ग्रास उठाये उतने ही बार शंख बजा । राजा ने कहा, मैं इस शंख को हाथ से तोड़ डालूंगा । हे बुद्धिमान श्रीकृष्ण ! यह भली प्रकार क्यों नहीं बज रहा है । रुक-रुक कर क्यों बज रहा है । साधु महाराज के ग्रास-ग्रास जीमने पर तो यह बजा किन्तु एक-एक कण के ऊपर यह दुष्ट क्यों नहीं बजा अर्थात् लगातार बिना रुके क्यों नहीं बजा ।
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इतने में ही शंख कहने लगा, हे देव ! हे देवाधिदेव ! मुझे दोष मत दीजिये । जो भी दोष है वह रानी द्रौपदी के कारण है । उनके मन में भक्ति का विचार न आकर जाति के ऊँच-नीच का विचार आ गया । इसकारण कण-कण (ग्रास-ग्रास) पर नहीं बजा । पहचान मिल गई कि किस कारण से शंख लगातार नहीं बज रहा है । तत्काल पांडवों ने द्रौपदी से पूछा । उसने स्वीकार किया । समझाने पर द्रौपदी का भ्रम समाप्त हो गया । उसने उन भक्तराज को बुलाकर भोजन कराया । भोजन करते ही पंचायण शंख जोर से लगातार ध्वनि करता हुआ बजने लगा । बषनां कहता है, वही शिरोमणि ही जो भगवद्भक्ति करता है । ऊँचे वर्ण में जन्म ले लेने से व्यक्ति ऊँचा नहीं बनता । ऊँचा भक्ति करने से होता है ॥११९॥

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