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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५२*
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छप्पय छंद
प्रथम भूमिका श्रवन चित्त एकाग्रहि धारै ।
दुतिय भूमिका मनन श्रवन करि अर्थ बिचारै ।
तृतिय भूमिका निदिध्यास नीकी बिधि करई ।
चतुर्भूमि साक्षातकार संशय सब हरई ॥
अब तासौं कहिये ब्रह्मबिदु बर बरयान बरिष्ट है ।
यह पंच षष्ट अरु सप्तमी भूमि भेद सुन्दर कहै ॥५२॥
इति अवस्था कौ अंग ॥२५॥
७. प्रसङ्गवश ज्ञान की चार भूमिकाओं का वर्णन :
श्रवण ज्ञान की प्रथम भूमिका है, जिस के माध्यम से जिज्ञासु का चित्त एकाग्र होता है ।
ज्ञान की द्वितीय भूमिका मनन से गुरुपदिष्ट शब्द के अर्थ पर विचार होता है ।
ज्ञान की तृतीय भूमिका निदिध्यासन से उस शब्द एवं अर्थ का सामञ्जस्य बैठाया जाता है(नीकी विधि करई) ।
ज्ञान की चतुर्थ भूमिका है - साक्षात्कार, जिस समस्त द्वैत भ्रम एवं संशय विनष्ट हो जाते हैं ।
और ज्ञान की पञ्चम भूमिका है - ब्रह्मवित्(वर) होना ।
षष्ठ भूमिका है - वरीयान् होना ।
तथा सप्तम भूमिका है - वरिष्ठ होना ।
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार शास्त्र में ज्ञान की सात भूमिकाएँ बतायी गयी हैं ॥५२॥
इति अवस्था का अंग सम्पन्न ॥२५॥
(क्रमशः)

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