शनिवार, 16 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ९/१२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ९/१२*
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सुषुपति मावस की निसा, अभ्र रहे पुनि छाइ । 
सुन्दर कछु सूझै नहीं, रूप सकल छिपि जाइ ॥९॥
(ग) और अमावस्या की अन्धेरी रात्रि में यदि घनघोर घटा(काले मेघ) छायी हो तो वही चित्र कुछ भी नहीं दिखायी देता । वहां सब कुछ लुप्त ही दिखायी देता है ॥९॥
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धूप जौन्ह तम रूप सौं, नैंन लिपै कहुं नाहिं । 
सुन्दर साक्षी आतमा, तीन अवस्था मांहिं ॥१०॥
यद्यपि इन तीनों ही अवस्थाओं में द्रष्टा के नेत्रों की शक्ति(सामर्थ्य) नष्ट नहीं होती, अपितु यथापूर्व ही रहती है । वहाँ धूप एवं जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति - इन तीन अवस्थाओं के भेद के कारण उस चित्र के तीन रूपभेद दिखायी देते हैं । इसी प्रकार, आत्मा, सर्वदा स्थित रहने पर भी, ज्ञानभेद या अवस्थाभेद के कारण वहाँ नहीं दिखायी देता ॥१०॥
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बाजीगर परदा किया, सुन्दर बैठा मांहिं । 
खेल दिखावै प्रगट करि, आप दिखावै नांहिं ॥११॥
३. अवस्था का तृतीय भेद : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे कोई बाजीगर पर्दे के पीछे गुप्त(छिपा हुआ) बैठ कर दर्शकों को विविध प्रकार के खेल दिखावे ॥११॥
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नर पशु पंखी काठ कै, प्रगट दिखावै खेल । 
हस्त क्रिया सब करत हैं, सुन्दर आप अकेल ॥१२॥
वहाँ वह(बाजीगर), स्वयं अकेला होता हुआ भी, अपने हाथ की अंगुलियों के सङ्केत से चालित काष्ठ की बनी मनुष्य पशु एवं पक्षियों की पुतलियों से नाना प्रकार के खेल दिखाता है ॥१२॥
(क्रमशः) 

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