शनिवार, 16 मई 2026

गुर मिलियौ राम नाम दिढ़ायौ

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढे आय ।*
*दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाय ॥*
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*गुरमहिमा ॥*  
गुर मिलियौ राम नाम दिढ़ायौ । भू सागर मैं ‘भेलौ’ पायौ ॥टेक॥ 
डूबण दिखायौ तिरण सिखायौ । अगम गवण मैं गमि व्है आयौ ॥
देख्या औघट देख्या घाट । दुह बिच गुरू दिखाई बाट ॥
जहाँ सूझै न बूझै न वार न पार । तहाँ मिलियौ पार उतारहणहार ॥ 
भौसागर की लहरि दिखाली । काई काई बषनैं टाली ॥१२१॥    

मंगलदासजी महाराज की प्रति में ‘भेलौ’ की जगह ‘भैरौ’ पाठ है ।  वि. स. १७८० तथा १७८५ दोनों की पुस्तकों में ‘भेलौ’ पाठ ही है । संसार रूपी सागर मैं भी निवास करता हूँ तथा गुरुमहाराज भी करते हैं । अतः वे मुझे संसार में साथ-साथ रहते हुए ही मिल गये और उन्होंने दुनियादारी के सारे झंझट-झगड़ों से दूर करके मुझे राम-नाम में निमग्न करा दिया । 
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संसार-सागर में जिन कारणों से मनुष्य डूबता है उनको उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष में दिखाया । साथ ही मुझे यह सुखाया कि संसार-सागर से कैसे तिरा जाता है । अगम = परमात्मा में गवण = प्रवेश कैसे होता है, परमात्मा की प्राप्ति कैसे होती है, वह भी उन्होंने मुझे बताया जिससे मुझे परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया । 
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मैंने साधना करते समय औघट = ऊबड़-खाबड़ रास्ते = नानाप्रकार की तंत्र-मंत्र, पाठ-पूजा आदि की साधनाएँ तथा घाट =राजपथ रूपी नाम की साधना पद्धति को भी देखा । गुरुमहाराज ने दोनों का यथार्थ विवेचन करके मुझे रामनाम की साधना रूपी राजमार्ग का रास्ता बता दिया । गुरुमहाराज रूपी केवट उस भवसागर रूपी संसार में मुझे मिले जहाँ इतना अज्ञानांधकार है कि कुछ दिखाई ही नही देता है । 
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उस संसार-सागर में रहने वाले विषयविकार रूपी जल में इस कदर डूबे हुए हैं कि पूछने पर कोई ऊपर उठने का रास्ता बताने में भी सक्षम नहीं है । संसार-सागर अथाह एवं अपार है । ऐसे संसार-सागर में पार उतारने वाला सद्गुरु महाराज मुझे मिले । उन्होंने भवसागर में विषयभोगों की उठने वाली नानातरंगों को भी दिखाया जिनकी चपेट में आकर जीव अपना संतुलन खोकर डूब मरता है किन्तु मैंने गुरुमहाराज की कृपा से काई-काई = कड़े प्रयत्न के द्वारा उन्हें टाली = अप्रभावी करके अपना लक्ष्य हाँसिल कर लिया ॥१२१॥ 

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