शुक्रवार, 15 मई 2026

*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१२. ब्रह्म अग्नि का अंग ~१/४*
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*ब्रह्म अग्नि सु विचार है, मैल दहै मन माँहिं ।*
*रज्जब रज यूं उतरे, अभि अंतरि अघ जाँहिं ॥१॥*
भली प्रकार ब्रह्म-विचार ही ब्रह्माग्नि है, वह मन के भीतर के मल विक्षेपादि मैल को जलाता है । इस प्रकार ही मन की मोह रूप रज और आन्तर पाप नष्ट होते हैं ।
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*काया कर्म काष्ठ जरहिं, ब्रह्म अग्नि बिच आन ।*
*पावक प्राण२ खुले पावक सौं, रज्जब शून्य१ समान ॥२॥*
काष्ठ में अग्नि डाला जाता है तब काष्ठ जलकर काष्ठ में बद्ध अग्नि मुक्त हो जाता है और दोनों अग्नि आकाश१ में अदृश्य होकर व्यापक अग्नि में मिल जाते हैं, वैसे ही गुरु उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्मज्ञान आने पर कर्म समूह जलकर अज्ञान से आच्छादित स्वस्वरूप आत्मा आज्ञान से मुक्त हो जाता है । फिर आत्मा२ तथा ज्ञान दोनों ही सर्व-विकार शून्य ब्रह्म में समा जाते हैं ।
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*काया काष्ठ गुण घुण कर्म, प्राणी पावक पाया मर्म१ ।*
*गुरु मुख अग्नि ब्रह्म गियान, रज्जब वह्नी२ वह्नी खुलान ॥३॥*
काष्ठ में घुण रहते हैं और काष्ठ को ही खाते हैं, किन्तु उस काष्ठ में अग्नि डाला जाय तो काष्ठ के भीतर बँधा हुआ अग्नि मुक्त हो जायेगा और घुणों को भी भस्म कर डालेगा । वैसे ही शरीर में गुण तथा कर्म हैं और शरीर को दु:खी सुखी करते हैं, किन्तु गुरु मुख से सुने हुये ब्रह्म ज्ञान रूप अग्नि को मुख से सुने हुये ब्रह्म-ज्ञान रूप अग्नि को अन्त:करण में लाया जाय तो अज्ञान के द्वारा काया में बद्ध आत्मा रूप अग्नि२ मुक्त हो जायेगा और गुण तथा कर्मों को नष्ट कर देगा । उक्त प्रकार ही अग्नि से अग्नि मुक्त होता है । यह रहस्य१ हमको श्री गुरुदेव के उपदेश द्वारा ही प्राप्त हुआ है ।
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*प्रभु प्रभाकर१ अंश है, आतम तन तिनु२ आग ।*
*रज्जब संकट शोभ तैं३, सोइ मुक्त जब जाग ॥४॥*
सूर्य१कान्तमणि(आतशी शीशा) के नीचे तृण२ हों और उस मणि में सूर्य की किरण पड़े, तो तृणों में अग्नि प्रगट हो जाता है और तृण भस्म हो जाता है, अग्नि अपने अंशी में मिल जाता है, वैसे ही आत्मा ईश्वर का अंश है और शरीर में वद्ध है जब गुरु-उपदेश द्वारा अन्त:करण में ब्रह्म-ज्ञान आता है तब तब आत्मा अज्ञान निद्रा से जाकर गुण कर्मादि से मुक्त हो जाता है । इस प्रकार तनाध्यास, गुण-विकार और कर्मों के नाश रूप संकट से३ ही आत्मा की शोभा होती है, वह ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

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