🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दया तुम्हारी दर्शन पइये ।*
*जानत हो तुम अंतरजामी,*
*जानराय तुम सौं कहा कहिये ॥*
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*परमात्मा की दयालुता ॥*
हरि बिन जीव दया कौंण पालै । मिहर करै तो मूँवा जीवालै ॥टेक॥
जल बिन जीव दुखी उन्हालै । छाजाँ छाजाँ पाणी रालै ॥
आनि दुखी तब साम्हौं न्हालै । धर फरफूलै धानि धपालै ॥
जीव दुखी अधियारै होवै । तौ सूर सारिखा दीपक जोवै ।
जीव गरम जब अंग अघोलै । तब पवन बीजणौं दिन कौ ढोलै
ज्यूँ दिन कियौ कमावण नैं । त्यूँ राति करी सुख पावण नैं ॥
ज्यूँ मनिख किया रस लेबा नैं । त्यूँ ब्रिच्छ किया फल देबा नैं ॥
राजिक रिजक सबनि कौं स्वामी । जल थल पूरै अंतरजामी ॥
दीन दयाल सदा ही माधौ । बषनां भूलाँ भेद न लाधौ ॥१२३॥
“मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वंदे परमानंद माधवम् ॥”
“मूक होइ बाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन ।
जासु कृपा सो दयालु, करहुँ कृपा मर्दन मयन ॥”
हरि के बिना जीवों पर अकारण ही दया कौन कर सकता है । उसकी तनिक सी दया मृतक को भी तत्काल जीवित कर देती है ।
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ग्रीष्मऋतु में जल की कमी के कारण चर-अचर समस्त जीव दुखी हो जाते हैं किन्तु वह अकारण दयालु परमात्मा किसी को भी जलाभाव में मरने नहीं देता । वह उनको सुखी करने के लिये छाजाँ-छाजाँ = स्थान-स्थान पर जल की वर्षा करता है । जब वे दुखी होने लगते हैं तथा करुण क्रंदन करते हैं तब जल उनके सम्मुख ही वर्षा देता है जिससे भूमि प्रफुल्लित = हरी भरी हो जाती है तथा धानि = अन्न प्रभूत मात्रा में उपज जाता है ।
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अंधकार के कारण जब जीव दुखित हो जाते हैं तब वह परमात्मा सूर्य जैसे अपरिमित प्रकाशपुंज के दीपक को जलाकर उजाला कर देता है । जब अत्यधिक उष्ण के कारण समस्त जीव अधीर होकर उघाड़े अंग रहने लगते हैं तब वह परमात्मा पंखा रूपी शीतल-मंद-सुगंधित मलय चला देता है । परमात्मा ने यदि दिन परिश्रम करके कमाने खाने को बनाया तो रात्रि सुख पाने के लिये भी बनाई है ।
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जिस प्रकार मनुष्यों को नाना वनस्पतियों का रसास्वादन करने को बनाया है वैसे ही उस परमात्मा ने अठारह भार वनस्पति फल-फूल, रसादि-पंच स्कंधात्मक अपने उत्पाद देने को बनाई है । वह परमात्मा राजिक = पालक-पोषणकर्त्ता, रिजक = कामधंधा आदि सभी का स्वामी है । वह अंतर्यामी जल और थल पर रहने वाले सभी को पूरता है । वह माधव सदा ही दीनों पर दया करने वाला है ।
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बषनां कहता है जो उसको भूल जाता है, वे उसके रहस्य को, उसकी दया के रहस्य को जान नहीं पाते हैं । दादूवाणी~
“पूरि रह्या परमेसुर मेरा, अणमांग्या देवै बहुतेरा ॥टेक॥
सिरजनहार सहज मैं देइ । तौ काहे धाइ मांगि जन लेइ ॥
बिसंभर सब जग कौं पूरै । उदर काज नर काहे झूरै ॥
पूरिक पूरा है गोपाल । सब की चिंत करै दरहाल ॥
समरथ सोई है जगनाथ । दादू देखि रहे संग साथ ॥४८॥” ॥१२३॥
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