रविवार, 17 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग १३/१६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर चेतनि शक्ति बिन, नाचि सकै नहिं कोइ । 
त्यौं यह जाग्रत जानिये, जो कछु जाग्रत होइ ॥१३॥
सभी जानते हैं कि चेतनशक्ति की सहायता के विना किसी जड वस्तु में कोई क्रिया(हलचत) नहीं हो सकती; अतः इस अवस्था को जाग्रत् समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ जो कुछ देखा जाता है वह सब कुछ जाग्रदवस्था के समान ही है ॥ १३॥
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बहुरि वहै रजनी बिषै, परदा करै बनाइ । 
सुन्दर बैठा गोपि ह्वै, बाहरि खेल दिशाइ ॥१४॥
वही बाजीगर जब रात्रि में दर्शकों को अपनी बाजीगरी(तमाशा = खेल) दिखाना चाहता है तो वह एक पर्दा लगाकर, उस के पीछे गुप्तरूप से बैठकर, बाहर(खुले स्थान में) नाना प्रकार के खेल दिखाता है ॥१४॥
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नर पशु पंखी चर्म कै, दीसहिं रूप अनेक । 
सुन्दर चेतनि शक्ति करि, नांच नचावै एक ॥१५॥
वहाँ बैठे दर्शक उस छिपे हुए बाजीगर के हाथ की अंगुलियों के संकेत से सञ्चालित चाम से बनी मनुष्य पशु एवं पक्षियों की पुतलियों के विविध खेल देखते हैं ॥१५॥
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यौं यह स्वप्नै देखिये, जाग्रत कौ आभास । 
सुन्दर दोऊ भ्रम भये, जाग्रत स्वप्न प्रकास ॥१६॥
बाजीगर का यह खेल उसी प्रकार का है जैसे हम जाग्रत् अवस्था में कृत कर्मों का स्वप्न में आभास देखते हैं । बाजीगर का वह खेल और स्वप्न में जाग्रत अवस्था का यह आभास - दोनों को ही भ्रमात्मक अवस्था कहा जा सकता है ॥१६॥
(क्रमशः)

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