गुरुवार, 21 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१/४*
.
*भै मिल आतम यूं बँधे, ज्यों जल शीत हि लाग ।*
*रज्जब अचरज देखिया, कुंभ काया दे त्याग ॥१॥*
जैसे शीत लगने से जल का पिंडा बँध जाता है और ऐसा आश्चर्य देखा जाता है कि - घड़े का त्याग करके भी फैलता नहीं, वैसे ही भय से प्राणी बंध जाता है और शरीर का त्याग करने पर भी जिसका भय है उसको त्यागता नहीं, अर्थात जिससे डरता है उसीके आकार वृत्ति रहती है ।
.
*समझ शीत लागे जमहि, प्राणी पाणी दोय ।*
*फूटे में सारे रहैं, रज्जब देखा जोय ॥२॥*
शीत लगने से जल जम जाता है और बर्तन फूटने पर भी बर्फ साबित रहता है, वेसे ही विचार पूर्वक भय से प्राणी एक स्थिति में स्थिर रहता है और किसी अंग विशेष के टूटने पर भी डिगता नहीं, यह हमने देखा है और हे साधक ! तू भी इस स्थिति में आकर देख ।
.
*जमै जीव जल ठाहरे, रायल१ काया कुंभ ।*
*रज्जब पिधले बह चले, देखो आतम अंभ२ ॥३॥*
जल२ शीत से जम जाने से तो दरार१ वाले घड़े में ही ठहर सकता है और ताप के द्वारा पिधलते ही बह चलता है, वैसे ही जीव जन्मादि दु:ख के भय से उपासना करके ब्रह्म में स्थिर होने से तो नाना छिद्रों वाला शरीर में भी स्थिर रहता है और विषयाशा ताप से तपने से पिघलकर अर्थात चंचल होकर विषयों की ओर बह चलता है ।
.
*भयभीत बिना भूले नहीं, देह विदेह न होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत कूं, कीट भृंग ले जोय ॥४॥*
जन्मादिक भय से डरे बिना ब्रह्म चिन्तन द्वारा देहाध्यान त्याग कर विदेह नहीं हो सकता, इसमें कीट-भृंग का दृष्टांत प्रसिद्ध है । देख लो भृंग के भय से कीट शरीर धारण करता है, वैसे ही जीव ब्रह्म बन जाता है ।
(क्रमशः) 
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें