मंगलवार, 19 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २५/२८*
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सुपिनै मैं जाग्रत बहै, बचन कहै मुख द्वार । 
ज्वाब देत हैं और कौं, सुन्दर शुद्धि न सार ॥२५॥
तथा कभी कभी मनुष्य स्वप्नावस्था में भी जाग्रदवस्था के समान बोलने(प्रलाप करने) लगता है । वह किसी अन्य को ऐसा उत्तर देने लगता है जिसमें न कोई सचाई होती है, न कोई सार(तत्त्व) ॥२५॥

स्वप्नै माहैं स्वप्न है, देखै नाना रूप । 
जागैं तैं सब कहत है, सुन्दर छाया धूप ॥२६॥
कभी कभी मनुष्य पर स्वप्नावस्था में ही स्वप्नावस्था आरूढ हो जाती है, उस अवस्था में वह ऐसे ऐसे रूप देखता है कि जागने पर उन्हें धूप एवं छाया का खेल बताता है ॥२६॥
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सुन्दर ऐसैं जानियें, सुषुपति स्वप्ना मांहिं । 
स्वप्नै ही मैं अनुभवै, जागै जानैं नांहिं ॥२७॥
परन्तु जब स्वप्नावस्था में सुषुप्ति अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष स्वप्न में अनुभूत किसी भी घटना को स्मरण नहीं कर पाता ॥२७॥
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सुषुपति मैं जाग्रत उहै, जानी करि अनुमांन । 
जागें ते ततपर भयौ, सब इन्द्रिनि कौ ज्ञांन ॥२८॥
सुषुप्ति अवस्था में जब जाग्रत् अवस्था पहुँच जाती है तो वह पुरुष, अनुमान का सहारा लेकर, उन सब घटनाओं का स्मरण कर लेता है; क्योंकि जाग्रदवस्था में सभी इन्द्रियों का ज्ञान यथाभूत(तत्पर) रहता है ॥२८॥
(क्रमशः)

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