गुरुवार, 21 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग २९/३२*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २९/३२*
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सुषुपति ही मैं स्वप्न है, जागै बक्रित चित्त । 
कछूक बार लखै नहीं, सुन्दर चित्त अबित्त ॥२९॥
सुषुप्ति अवस्था में स्वप्न अवस्था आने पर उस मनुष्य का चित्त कुछ भ्रान्त रहता है; अतः कभी उसे, चित्त के व्यवस्थित रहने पर, वे घटनाएँ स्मरण रहती हैं, परन्तु कभी कभी चित्त के भ्रान्त होने पर, उसी को वे घटनाएँ स्मरण नहीं भी रहतीं ॥२९॥
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सुषुपति मैं सुषुपति उहे, सुख अनुभवै प्रभाति । 
सुन्दर जागैं कहत है, सुख सौं सूते राति ॥३०॥
जब सुषुप्ति अवस्था सुषुप्ति अवस्था में ही पहुँच जाती है तो जाग्रदवस्था में आने पर वह मनुष्य दूसरों को इस प्रकार सुनाता है कि "मैं रात्रि में बहुत सुखपूर्वक सोया"(सुखमहमस्वाप्सम्) ॥३०॥
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तीन अवस्था भेद है, तीनौं ही भ्रमकूप ।
चौथी तुरिया ज्ञानमय, सुन्दर ब्रह्म स्वरूप ॥३१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ये तीन अवस्था - भेद बता दिये गये । ये तीनों ही भ्रम के गहरे गर्त(कूप) के समान हैं । इनके बाद चतुर्थ अवस्था तुर्य अवस्था कहलाती हैं । यह पूर्ण ज्ञानमय एवं ब्रह्म का साक्षात्कार कराने वाली है ॥३१॥
[महात्मा, सिद्ध एवं गुरु की तीन श्रेणियाँ होती हैं - वर, वरीयान् एवं वरिष्ठ । श्रीसुन्दरदासजी के अनुसार, वर के उदाहरण हैं - अष्टावक्र एवं वशिष्ठ मुनि । वरीयान् अवस्था के उदाहरण माने जा सकते हैं - दत्तात्रेय एवं शुकदेव मुनि । तथा ऋषभ देव वरिष्ठ श्रेणि में आते हैं । महात्मा श्रीसुन्दरदासजी अब इन तीनों श्रेणियों का विस्तृत व्याख्यान कर रहे हैं - ]
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बर बरियान बरिष्ट पुनि, तीनहुं कौ मत एक । 
भिन्न भिन्न ब्यौहार है, सुन्दर समुझे बिबेक ॥३२॥
५. अवस्थाओं का अन्य भेद : अवस्थाओं का एक भेद १. वर, २. वरीयान् एवं ३. वरिष्ठ भेद से भी है । यद्यपि इन तीनों के मत(सिद्धान्त) समान ही हैं । हाँ, तीनों के व्यवहार में अवश्य अन्तर है । उस अन्तर को ही विवेकपूर्वक समझ लेना चाहिये ॥३२॥
(क्रमशः)

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