गुरुवार, 21 मई 2026

घणनामी तणैं मारगि माल्हताँ

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि ।*
*जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥*
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राग सिंधूड़ौ ॥९॥भेष॥
घणनामी तणैं मारगि माल्हताँ, बिरलौ कोइ एक पार गहै । 
सूरा जाँहिं काँदरै काइर, पखाँ दहूँ बिचि बाट बहै ॥टेक॥
हिन्दू तुरक दोउ दल झूँब्या, बाणी बचन न बीसरियौ । 
लड़तौ जुड़तौ सूरापण करतौ, नामौं एणैं मारगि नीसरियौ 
बेद कुराणाँ मुसलमाना, इनमैं अचिरज येह भयौ । 
दहूँ दलाँ नैं लोह लगायौ, येणैं पंथ कबीर गयौ ॥
सोझौ सेन पीपौ पाखरियौ, जन रैदास नीषेड़ि खिड़ी । 
वै अविनासी नगरि पहूँता, बीजी परजा भूलि पड़ी ॥
गोरख हणूँ भरथरी सुखदेव, करता आया तिमैं कियौ । 
बषनां दोस किसौ दादू नैं, पंथ पुरातम सोधि लियौ ॥१२६॥
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“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्माम् वेत्ति तत्त्वतः ॥ गीता ॥७|३॥” 
गीता के इस श्लोक में व्यक्त भावना ही उक्त पद का मुख्य स्वर है । बषनांजी कहते हैं, परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर चलने वालों में से कोई एक विरला ही पूरे मार्ग को पार करके परमात्मा को प्राप्त कर पाता है । जो शूरवीर होते हैं वे तो साधना रूपी मार्ग पर हर परिस्थिति में अग्रसर होते रहते हैं किन्तु जो कायर होते हैं वे काँदरै = भयभीत होकर दोनों ही मार्गों के बीच के रास्ते पर चलते हैं । 
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(जो संसार के विषयभोग, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मात्सर्यादि समस्त दुर्गुण दुराचारों का दमन करता हुआ परमात्मा का अहर्निश भजन-ध्यान करता है वह शूरवीर है । इसके विपरीत जो परमात्मा की भक्ति करके मुक्ति को चाहता है किन्तु संसार तथा संसार के आकर्षण सुख-सुविधाएँ नहीं छोड़कर परमात्मा की भक्ति भी करता है तथा संसार में भी रागसहित वर्तता है, वह कायर है । सुख-सुविधाओं को छोड़ते हुए भय खाता है तथा यमराज के दुखों को सुनकर भी भय खाता है । अतः दोनों ही मार्गों का अवलम्बन करता है । परिणामस्वरूप न राम मिलता है और न आराम ही मिलता है ।) 
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अपने-अपने ग्रंथों में लिखे वचनों को विस्मृत नहीं करके उल्टे स्मरण कर-करके हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही पक्षों के लोग आपस में झूब्या = खूब लड़े । इन लड़ते हुओं तथा जुड़ते हुओं के मध्य ही में से आन्तरिक शत्रुओं का संहार करता हुआ शूरवीर नामदेव इसीमार्ग से गमन करके परमात्मा को प्राप्त हो गया । वेदों ने अनुयायी हिन्दुओं तथा कुरान को मानने वाले मुसलमानों के मध्य में एक अद्भुत आश्चर्य हुआ । 
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इन दोनों ही सिद्धान्तों की खरी आलोचना करके, उनकी गलतियाँ बताकर कबीर ने एक तीसरा ही निराला पंथ प्रकट कर दिया और उस पर चलकर वह परमात्मा को पा गया । सोझा, सेन नाई, राजा पीपा खींची, और रैदास चमार ने राम-नाम रूपी पाखरियौ = कवच पहनकर भक्ति रूपी निसेनी (निश्रेणी = सीढ़ी) तैयार की जिसपर चढ़कर वे अविनाशी परमात्मा रूपी नगर में सहजरूप में ही पहुँच गये । जिन दुनियावी लोगों ने उनका अनुगमन नहीं किया, वे भ्रम-भूल में पड़े रह गये । 
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जिस रास्ते का आश्रय लेकर योगीराज गोरक्षनाथ, भक्तप्रवर ज्ञानी नाम अग्रगण्य हनुमान, भर्तृहरि, शुकदेव मुनि आदि साधना के क्षेत्र में आगे अग्रसर हुए उसी रास्ते = सिद्धान्त का अवलम्बन लेकर दादूजी ने सत्य-सनातन-पुराण-पुरुषोत्तम – परमात्मा का रास्ता शोधकर जनता के सामने प्रस्तुत किया है, तो बताइये, इसमें दादूजी का क्या दोष है । दादूजी ने  क्या नया कर दिया । क्या भ्रष्ट कर दिया जनता को ॥१२६॥ 


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