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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~५/७*
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*रसना रस हि न लाइये, हिरदै नाँहीं हेत ।*
*रज्जब राम हिं क्या कहैं, हम ही भये अचेत ॥५॥*
न तो रसना इन्द्रिय को उसके चिन्तन रस में लगाते, न हृदय में प्रेम ही करते, अत: हम ही असावधान हो रहे हैं, राम को कहैं भी क्या ?
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*पिंड प्राणि रोगी नहीं, औषधि नाम न लेहि ।*
*तो वैद्य विधाता क्या करै, दारू दर्शन देहि ॥६॥*
प्राणी का शरीर रोगी न हो तो वह औषधि का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे वैद्य औषधि देकर क्या करेगा ? वैसे ही प्राणी में विरह-व्यथा है ही नहीं और वह प्रभु दर्शन का नाम भी नहीं लेता, फिर उसे प्रभु दर्शन देकर क्या करेंगे ? अर्थात जो जिस का पात्र होता है उसकी प्राप्ति से उसे लाभ होता है अन्य को नहीं होता ।
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*दारू चाहे दर्द वंद, निरोग सु नहिं लेय ।*
*औषधि अरथी आतमा, जो माँगे सो देय ॥७॥*
जिसके रोगजन्य दर्द होता है, वही औषधि चाहता है । जो भली प्रकार निरोगी है वह तो औषधि वह तो औषधि मिलने पर नहीं खाता, जो औषधि का इच्छुक प्राणी है वह तो औषधि का जो मूल्य माँगे वही देकर लेता है, वैसे ही जिसके वियोगजन्य व्यथा है, वही हरि-दर्शन चाहता है और सर्वस्व देकर भी लेने को तैयार रहता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१३. विरह विभंग का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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