मंगलवार, 19 मई 2026

*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१३. विरह विभग्ङका अंग ~१/४*
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*दर्द नहीं दीदार का, तालिब१ नाँहीं जीव ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहाँ मिले सो पीव ॥१॥*
न तो जीव जिज्ञासु१ है और न हरि-दर्शनार्थ उसके हृदय में पीड़ा ही है, फिर विरह वियोग व्यथा बिना वे प्रियतम प्रभु कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*दर्द बिना क्यों देखिये, दर्शन दीन दयाल ।*
*रज्जब विरह वियोग बिन, कहां मिले सो लाल ॥२॥*
दीनदयालु परमात्मा का साक्षात्कार बिना साधन कष्ट उठाये कैसे किया जा सकता है । विरहजन्य वियोग व्यथा के बिना वे प्रियतम कहां मिलते हैं ? अर्थात नहीं मिलते ।
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*श्रवणों सुरति न पीव की, प्रेम न लेहि समाय ।*
*रज्जब रुचि माँही नहीं, कहां मिले सो आय ॥३॥*
न तो कान से भगवद् यश सुनने की वृत्ति ही बनती है, न प्रभु -प्रेम को अपनाकर हृदय में धारण करता है, जब हृदय में प्रभु से मिलने की रुचि ही नहीं तब वे कहां आकर मिलेंगे ? अर्थात वे हृदय में ही प्रकट होकर मिला करते हैं, तो हृदय उनके प्रकट होने योग्य है नहीं ।
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*नयनों नेह न नाह१ का, वहिं दिशि दृष्टि न जाँहिं ।*
*रज्जब राम हि क्यों मिले, तालिब२ नाँहीं माँहिं ॥४॥*
न तो नेत्रों में ही प्रभु१ का स्नेह है, न उन प्रभु की और विचार दृष्टि ही जाती है, अर्थात प्रभु मिलन सम्बन्धी विचार ही नहीं होता । जब जिज्ञासु२ जैसी भावना ही मन में नहीं है, तो फिर राम कैसे मिलेंगे ।
(क्रमशः)

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