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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ६०/६२*
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*सकल बोल विरकत भये, गुरु वाइक मन लाग ।*
*रज्जब रोवे दर्श को, यहु साँचा वैराग ॥६०॥*
विरह उत्पन्न होने पर साधक संपूर्ण वचन विलास से विरक्त हो जाता है, केवल सद्गुरु वचनों में उसका मन लगता है और रात्रि दिन प्रियतम प्रभु के दर्शनार्थ रोता रहता है, वह विरहपूर्वक वैराग्य ही सच्चा वैराग्य है ।
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*वे परवाही बपु१ से, ता२ ऊपर वैराग ।*
*रज्जब रोवे इस मते३, ता शिर मोटे भाग ॥६१॥*
जो शरीर१ पोषणादि की परवाह नहीं करता और उस२ बे परवाह रूप भावना से भी विरक्त रहता है अर्थात उसका अभिमान भी मन में नहीं आने देता । ऐसे विचार३ में स्थिर होकर भी भगवद् दर्शनार्थ रात्रि-दिन रोता है उस महानुभाव का विशाल भाग्य है ।
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*माँहिं बहै बाहर कहै, सो सुन रीझे राम ।*
*रज्जब बातों के विरह, कदे न सीझे काम ॥६२॥*
जैसे विरह भीतर धारण करता है वैसा बाहर भी करता है, उसी को सुन कर रामजी प्रसन्न होते हैं और जो केवल विरह की बातें ही करते हैं, उन बातों से कभी भी भगवान् की प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध नहीं होता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “१०. विरह का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)
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