सोमवार, 11 मई 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५३/५५

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५३/५५
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पोसत माहिं अफीम है, बृक्षन मैं मधु जांनि । 
देह माहिं यौं आतमा, सुन्दर कहत बखांनि ॥५३॥
जैसे पोस्त(अफीम का पौधा या फूल) में अफीम सर्वत्र व्याप्त रहती है, तथा सभी वृक्षों में सात्त्विक माधुर्य(मिठास) रहता है; इसी प्रकार सभी प्राणियों की देहों में आत्मा व्याप्त रहता है ॥५३॥
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सुन्दर ब्रह्म अबर्न है, ब्यापक अग्नि अबर्न । 
देह दार तें देखिये, पावक अंतहकर्न ॥५४॥
ब्रह्म अनिर्वचनीय : जैसे काष्ठ में सर्वत्र व्याप्त अग्नि का वर्णन(व्याख्यान) नहीं किया जा सकता, या उस का रूप(आकार) नहीं बताया जा सकता; परन्तु काष्ठ को देख कर ही उस का अनुमान किया जा सकता है । इसी प्रकार परमात्मा(ब्रह्म) भी अवर्णनीय(अनिर्वचनीय) है, उस का व्याख्यान नहीं किया जा सकता, न उसका रूप आदि ही बताया जा सकता है । यह तो अन्तःकरण(मन, बुद्धि चेतना एवं अहङ्कार) द्वारा ही जाना समझा जा सकता है ॥५४॥
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तेज प्रकास रु कल्पना, जब लग संग उपाधि । 
जब उपाधि सब मिटि गई, सुंदर सहज समाधि ॥५५॥
जब तक इस जीव को तेज, प्रकाश एवं कल्पना की उपाधियाँ साथ लगी हुई हैं तभी तक इस का ब्रह्म से व्यवधान प्रतीत हो रहा है । जिस दिन से उपाधियाँ मिट जायँगी, उसी दिन उस को सहज समाधि द्वारा ब्रह्म का साक्षात्कार हो जायगा ॥५५॥
(क्रमशः)

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