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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ३३/३६*
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*काया काष्ठ मनुवा धोम,*
*इश्क अग्नि मिल जाँहिं सु व्योम ।*
*आदि अंत मधि मुक्ति सुमाग,*
*रज्जब लहिये पूरण भाग ॥३३॥*
जैसे अग्नि के संयोग से काष्ठ की धुआँ आकाश में चली जाती है, वैसे ही विरह-युक्त प्रेम से मन शरीरासक्ति को छोड़ कर परब्रह्म के स्वरूप में लीन होता है । सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त में भी यह विरह ही मुक्ति धाम का सुन्दर मार्ग माना जाता है । कोई भाग्यशाली ही इस पूर्णब्रह्म प्राप्ति के साधन मार्ग को ग्रहण करता है ।
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*नर नारी सब नाज, विरहा बारू भाड़ की ।*
*रज्ज्ब अज्जब साज, काचे पाके परसतैं ॥३४॥*
जैसे नाज के कच्चे दाने भाड़ की गरम बालू से मिलकर पक जाते हैं, उनकी उगने की शक्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही नर नारी भगवद् विरह के ताप से पक जाते हैं, उनकी जन्मादि क्लेशदायिनी शक्ति नष्ट हो जाती है । अत: सिद्धावस्था को प्राप्त करने को लिये भगवद्-विरह अद्भुत सामग्री है ।
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*दोस्त नाँहिं दर्द सम, जे दिल अंदर होय ।*
*जीव सीव१ एकै करे, जे ब२ सदा हु ते दोय ॥३५॥*
यदि मन में हो तो विरह-व्यथा के समान जीव का मित्र अन्य कोई भी नहीं है, कारण, जो अब२ अज्ञान दशा में सदा से ही दो भास रहे हैं उन जीव और ब्रह्म१ को एक करता है ।
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*विरह अग्नि व्है युक्ति सौं, आतम सार१ मझार ।*
*कपट कीट कुल काढि दे, तामें फेर न सार ॥३६॥*
लोह१ के युक्ति से अग्नि लगाया जाय तो, लोह का सब मैल निकाल देगा । वैसे ही जीवात्मा में युक्ति पूर्वक विरह प्रकट होगा, तो उसका सब कपट निकाल देगा । उक्त बात सर्वथा सत्य है ।
(क्रमशः)

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