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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २१/२४
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जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि ।
सुन्दर यातें भिन्न ह्वै, अपनौ रूप बिचारि ॥२१॥
अतः तुम्हारे लिये हितकर यही होगा कि जो देह के विकार(दोष) हैं, उन को उसी तक सीमित रहने दो; क्योंकि तुम उस से भिन्न हो । स्व रूप पर कुछ तो विचार कर के देखो ! ॥२१॥
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सुन्दर यह नहिं यह नहीं, यह तौ है भ्रम कूप ।
नाहिं नाहिं करते रहैं, सो है तेरौ रूप ॥२२॥
'तुम में देह का यह विकार नहीं है' या 'यह नहीं है' - ऐसा बताने में बहुत समय लगेगा और इससे नाना प्रकार के भ्रमजाल के उद्भव की सम्भावना है; अतः इसके स्थान पर 'नहीं है', 'नहीं है' कहने से भी कार्य सिद्ध हो जायगा । इसी वर्णन में तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी छिपा है ॥२२॥
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एक एक कै एक पर, तत्व गिनैं तै होइ ।
सुन्दर तूं सब कै परै, तौ ऊपरि नहिं कोइ ॥२३॥
पचीस तत्वों की गणना में दूसरा तत्त्व पहले से पर है । इस प्रकार की गणना में तूं इन सब से पर है । तुझ से ऊपर(उत्तम) कोई तत्त्व नहीं है ॥२३॥
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एक एक अनुलोम करि, दीसहिं तत्व स्थूल ।
एक एक प्रतिलोम तें, सुन्दर सूक्षम मूल ॥२४॥
इन तत्त्वों की अनुलोम गणना में भी पहला तत्त्व दूसरे तत्त्व से स्थूल है । इसी प्रकार प्रतिलोम गणना में दूसरा तत्त्व पहले तत्त्व से सूक्ष्म है ॥२४॥
(क्रमशः)

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