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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग २१/२४*
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एक अवस्था कै विषै, तीनहुं बर्तैं आई ।
जाग्रत स्वप्न सुषोपती, सुन्दर कहत सुनाइ ॥२१॥
४. अवस्था का अन्य भेद : कभी कभी ऐसा भी होता है कि जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं के व्यापार का एक ही अवस्था में समन्वय हो जाता है । श्रीसुन्दरदासजी महाराज अब यही भेद बता रहे हैं ॥२१॥
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जाग्रदवस्था जानिये, सब इन्द्रिय ब्यापार ।
अपने अपने अर्थ कौं, सुन्दर करै विहार ॥२२॥
सामान्यतः सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों की खोज में ही अपनी चेष्टाएँ सीमित रखती हुईं स्व स्व व्यापार में लीन रहती है ॥२२॥
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जाग्रत मैं स्वप्ना बहै, करै मनोरथ आंन ।
नैंन न देखै रूप कौं, शब्द सुनै नहिं कांन ॥२३॥
कभी कभी जाग्रदवस्था में ही स्वप्नावस्था प्रवेश कर जाती है तो मनुष्य अन्य(चक्षु की) क्रिया करता हुआ शब्दक्रिया का चिन्तन करने लगता है । अर्थात् उस समय न उस के नेत्र अपना कर्म करते हुए किसी रूप को देख पाते हैं और न श्रोत्रेन्द्रिय ही अपना कर्म करती हुई भी कोई शब्द सुन पाती है ॥२३॥
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जाग्रत मैं सुषुपति भई, जबहिं तंवारौ होइ ।
सुन्दर भूले देह कौं, सुधि बुधि रहै न कोइ ॥२४॥
तथा कभी कभी विश्रान्त अवस्था में ऐसा भी होता है कि मनुष्य को जाग्रदवस्था में ही सुषुप्ति अवस्था आवृत कर(घेर) लेती है तब वह उसी समय निःसंज्ञ(बेहोश = तंवारौं) होकर अपने शरीर का भी विस्मरण कर बैठता है(और वह तत्काल गाढ निद्रा में पहुँच जाता है) ॥२४॥
(क्रमशः)

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