गुरुवार, 28 मई 2026

भौं मैं भजियौ राम

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।*
*राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥*
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*सुमिरण ॥*
भौं मैं भजियौ राम, यौं भौ भागौ रे । 
निसदिन हरि की नाँइ, सुमिरण लागौ रे ॥टेक॥
दोवड़ तेवड़ मैं करी रे, हरि सुमिरण की बाड़ि ।
ज्याँह कै पहरै को नहीं, ते नर मुसिया झाड़ि ॥
म्हारा घर कै आंगणैं रे, चेतन पहरा देइ ।
निधड़क सोवै कुम्हारड़ी रे, चोर न मटिया लेइ ॥
ज्याँह चोराँ चोरी करी रे, पर घर किया प्रवेस ।
सो चोर भया फिरि पाहरू, म्हारै गुर दीन्हौं उपदेस ॥ 
सूता था सुणि जागिया रे, सुण्याँ सहर मैं सोर ।
कहि बषनां बाथाँ पड़ी, म्हारी बहुटल मार्यौ चोर ॥१३३॥ 
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भू = संसार । भौ = भय, जनम-मरण का भय । दोवड़-तेवड़ = दोहरी (द्वंद्व = राग-द्वेष, सुख-दुःख आदि), तिहरी (सत, रज, तम गुण) । बाड़ि = पुराने समय में घर के चारों ओर काँटों से अहाता बनाया जाता था जिसे बाड़ लगाना कहा जाता था । मुसिया = लूट लिये गये । झाड़ि = झाड़-पौंछकर सब कुछ ले लेना, सर्वस्व को छीन लेना । आगणैं = चारों ओर । चेतन = सावधान मन, ज्ञान, विवेक । कुम्हारड़ी = कुम्हार की पत्नी, आत्मा । मटिया = मिटटी = मन । चौराँ = इंद्रियाँ । सहर = शरीर । बाथाँ = युद्ध । बहुटल = बुद्धि ।
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योगशास्त्र में पाँच क्लेशों का उल्लेख है । उनमें से पाँचवा क्लेश अभिनिवेश नाम्ना है जिसका तात्पर्य है, मृत्यु का भय कि कहीं मुझे मृत्यु आकर दबोच न ले । जिस व्यक्ति के मन में मृत्यु का भय समा जाता है, वह इससे अभय होने का प्रयत्न भी करता है । 
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यहाँ बषनांजी यही कह रहे हैं । मृत्यु के भय से भयभीत होकर मृत्यु से छुड़ा देने वाले रामजी को मैंने भजा । परिणामस्वरूप मेरा भय भाग गया । मैं निशिदिन आठों पहर हरि के नाम के स्मरण में लग गया हूँ । मैंने समस्त द्वंद्वों तथा तीनों गुणों को वशीभूत करके राम-नाम-स्मरण-का-अहाता = कवच मेरे शरीर रूपी घर के चारों ओर लगा लिया है । 
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जिन मनुष्यों ने राम – नाम की बाड़ नहीं लगाई है वे पूर्ण रूप से काल द्वारा लूट लिये गये हैं । वे पुनरपि जननं पुनरपि मरणं के चक्र में ही गोता खाते रहेंगे । मेरे घर रूपी शरीर के घट रूपी आंगन में चेतन रूपी ज्ञान पहरा देता है । हृदय में ज्ञान विराजता है जिससे आत्मा रूपी कुम्हारी अभय होकर सोती है, परमात्मा में एकरस स्थित रहती है क्योंकि इंद्रिय रूपी चौर मन रूपी मिटटी को अब चोर सकने में = संसाराभिमुख करने में समर्थ नहीं है । 
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जिन इंद्रियों रूपी चौरों ने ही विषयभोग रूपी चोरी करी थी तथा जिस मन में परमात्मा का निवास होना था उसमें प्रवेश करके उसको बिगाड़ा था, अब वे ही इंद्रियाँ पहरेदार बन गई हैं, मन को विषयों में जाने नहीं देती हैं । जो श्रवणेन्द्रिय पहले दुनियावी बाते सुनती थीं वे अब भगवद्गुण सुनने लगी हैं । जो आंखें परस्त्री, परधन की ओर देखा करती थीं वे अब संत-भगवंत दर्शन करने लगी हैं । जो त्वचा पहले कामोपभोग करने में आनंदानुभव करती थी अब वह संत-चरण स्पर्श में आनंद का अनुभव करती है । आदि आदि । 
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यह सब गुरु महाराज के उपदेश के कारण ही संभव हो पाया है । मेरी आत्मा, मन पहले अज्ञाननिद्रा में सोया पड़ा था किन्तु गुरु महाराज के उपदेश रूपी शोर को सारी सहर = शरीरस्थ सभी इंद्रियों ने सुना जिससे वे जागिया = विवेकवान हो गई । सत्यासत्य, नित्यानित्य विवेक सम्पन्न हो गई । 
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बषनां कहता है, मेरी बुद्धि रूपी बहुटल = बहु इन समस्त चौरों से = मनोविकारों से बाथाँ = गुत्थमगुत्था हो गई, युद्धरत हो गई । परिणामस्वरूप सारे दुर्गुण, दुराचार, मनोविकार शरीर में से निकाल कर भाग गये । मैं परमात्मा से एकाकार हो गया ॥१३३॥

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