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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५६/५८
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सुन्दर देह सराव मैं, तेल भर्यौ पुनि स्वास ।
बाती अंतहकरन की, चेतनि जोति प्रकास ॥५६॥
(श्रीसुन्दरदासजी उक्त तेज, प्रकाश एवं कल्पना का व्याख्यान कर रहे हैं -)
इस देह को सराब(मिट्टी का पात्र = दीपक) समझिये, श्वास को ही तैल समझिये, अन्तःकरण को बाती समझिये, तथा उस से उद्भुत तेज एवं प्रकाश को चेतना समझिये ॥५६॥
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सुन्दर पंद्रह तत्व कौ, देह भयौ सौ कुंभ ।
नौ तत्वनि कौ लिंग पुनि, मांहिं भर्यौ है अंभ ॥५७॥
ऊपर गिनाये गये इकतीस(३१) तत्त्वों में से आरम्भ के पन्द्रह(१५) तत्त्वों से निर्मित स्थूल शरीर को यहाँ कुम्भ घट) समझिये । बाद के नौ(९) तत्त्वों से निर्मित लिङ्गशरीर(कारणशरीर) को उसमें भरा हुआ जल समझिये ॥५७॥
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जीव भयौ प्रतिबिंब ज्यौं, ब्रह्म इंदु आभास ।
सुन्दर मिटै उपाधि जब, जहं के तहां निवास ॥५८॥
जीव को प्रतिबिम्ब समझिये । वह मानों चन्द्र रूप ब्रह्म का आभास है । जब उस जीव की सभी आधि-व्याधियाँ क्षीण हो जायँगीं तब वह जहाँ का तहाँ शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जायगा ॥५८॥
(क्रमशः)

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