मंगलवार, 12 मई 2026

*११. एकांगी प्रीति का अंग ~ १/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~ १/४*
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*प्रीति इकंग महा बुरी, दुख दीरघ दिल होय ।*
*काहि पुकारे किस कहै, बेली नाँहीं कोय ॥१॥*
पतंग की प्रीति दीपक में तो है किन्तु दीपक प्रीति पतंग में नहीं, वैसे ही भक्ति की प्रीति भगवान में हो और भगवान की प्रीति भक्त में नहीं हो तो प्रीति एकांगी कहलाती है और इससे महान दु:ख होता है, अत: यह बहुत बुरी है । इस स्थिति में प्रेमी किसको पुकारे ओर किसको कहे । इस स्थिति में कोई भी साथ नहीं देता, किन्तु भगवान के भक्त की यह स्थिति नहीं होती कारण भगवान् सर्वज्ञ हैं वे भक्त के हृदय को जानते हैं, उनका भक्त पतंग के समान नहीं मरता उसे दर्शन हो ही जाते हैं ।
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*प्रीति इकंगी लागतैं, प्राणि परे दु:ख द्वन्द ।*
*मरकट सूवा ज्यों बँधे, बिन बन्धन दृढ़ फंद ॥२॥*
जैसे वानर पृथ्वी में गड़ी हुई संकड़े मुख की चणे की हंडिया में दोनों मूठी चणे की भरकर बन्धन में पड़ता है और शुक पक्षी नलिका पर बैठकर नलिका घूम जाने से भ्रमवश बन्धन में पड़ता है वैसे ही एकांगी प्रीति लगाने से प्राणी महान् दुख की उलझन में पड़ता है वैसे ही एकांगी प्रीति लगने से प्राणी महान दुख की उलझन में पड़ जाता है और बिना ही बंधन दृढ़ फंदे में पड़ जाता है ।
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*चातक मोर पुकार सुन, कछु मेघ न आवे ।*
*तैसे रज्जब रटत है, पिव पीर न पावे ॥३॥*
चातक तथा मयूर पक्षी बहुत पुकारते हैं किन्तु मेध उनकी इच्छानुसार कब आकर वर्षता है, वैसे ही प्रेमी प्रभु को को रटते हैं किन्तु प्रभु तो उनकी हृदय की पीड़ा को भी नहीं देख पाते ।
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*चकोर चाहि चंद न उदय, जीव ब्रह्म त्यों आहि ।*
*नातो एक ही ओर को, यहु दुख कहिये काहि ॥४॥*
चन्द्रमा चकोर की इच्छा से नहीं उदय होता, वैसे ही जीव की इच्छा से ब्रह्म का दर्शन नहीं होता, कारण चन्द्रमा में तथा ब्रह्म में चकोर और जीव के समान प्रीति नहीं है । अत: इस एकांगी प्रीति का दु:ख किससे कहा जाय अर्थात् प्रेमपात्र की कृपा बिना नहीं मिटता ।
(क्रमशः)

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