सोमवार, 18 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग १७/२०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग १७/२०*
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अब सुनि सुषुपति की कथा, सुन्दर भ्रम कछु नांहि । 
काठ कर्म कौ खेल सब, धर्यौ पिटारा मांहिं ॥१७॥
मनुष्य की सुषुप्ति अवस्था आने पर, वह जाग्रत् का स्वप्न में आभास, बाजीगर के खेल के समान, सब कुछ लुप्त हो जाता है । वहाँ भ्रमात्मक स्थिति नहीं रह जाती; क्योंकि वह जान जाता है कि पिटारे में(पर्दे के पीछे) रखी हुअी काष्ठनिर्मित पुतलियों के खेल की तरह भ्रममात्र ही है ॥१७॥
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सुन्दर बाजीगर जुदौ, खेल करै दिन राति । 
वहै खेल रजनी करै, वह खेल परभाति ॥१८॥
वह जान गया है कि वह बाजीगर दिन एवं रात्रि का खेल पृथक् पृथक् दिखाता है; परन्तु यहाँ सचाई यह है कि वह बाजीगर जो खेल दिन में करता है, उसे ही रात्रि में भी दिखाता है ॥१८॥
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जाग्रत स्वप्न सु जमुनिका, सुषुपति भई पिटार । 
सुन्दर बाजीगर जुदौ, खेल दिखावन हार ॥१९॥
यहाँ जाग्रत् एवं स्वप्न अवस्था को बाजीगर के पर्दे(यवनिका) के समान समझिये तथा सुषुप्ति अवस्था को बाजीगर की पिटारी समझिये । तथा खेल दिखाने वाले बाजीगर को पृथक्(भिन्न) समझिये ॥१९॥
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तीन अवस्था कै परै, चौथी तुरिया जांनि । 
सुन्दर साक्षी आतमा, ताहि लेहु पहिचांनि ॥२०॥
इन तीन - जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं के आगे चतुर्थ तुर्य अवस्था जाननी चाहिये । इस अवस्था में पहुँच कर आत्मा को स्व रूप का साक्षात्कार करना चाहिये ॥२०॥
(क्रमशः)

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