शुक्रवार, 29 मई 2026

२६. बिचार कौ अंग ५/८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ५/८
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सुन्दर एक बिचार तें, हिरदौ निर्मल होइ ।
फिरत रहै जौ मसक लौं, काटन लागै कोइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इसी एकमात्र विचाररूप साधना से ही जिज्ञासु प्राणी का हृदय निर्मल(विकार रहित) हो सकता है । अन्यथा वह जगत् में मच्छर के समान घूमता रहेगा और मत मतान्तर के प्रतिपादन द्वारा वाद विवाद करता हुआ साधु सन्तों को डंक ही मारता रहेगा(कष्ट ही देता रहेगा) ॥५॥

सुन्दर साधन सब किया, बरकति दीसै नांहिं । 
आयौ हृदय बिचार जब, तब संमुझै हरि मांहिं ॥६॥
हमने भगवत्प्राप्ति के लिये अन्य सभी उपाय कर के देख लिये, हमें किसी भी उपाय से सफलता या लाभ(बरकत) नहीं मिला । जब हम को यह भगवच्चिन्तन रूप विचार सूझा तो हम को यह आश्वासन मिला कि हम एक न एक दिन उस प्रभु का साक्षात्कार कर ही लेंगे ॥६॥
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करत देह के कृत्य सब, जौ उर होइ बिचार । 
सुन्दर न्यारौ ई रहै, लिपै न एक लगार ॥७॥
इस उपाय के माध्यम से हम को समझ में आया कि भले ही हम व्यावहारिक दृष्टि से सभी लौकिक कर्म करते रहें; परन्तु वहाँ हम इतना ही करें कि उन से लिप्त न हों, उन में आसक्त न हों ॥७॥
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दधि मथि घृत कौं काढि करि, देत तक्र मंहिं डार । 
सुन्दर बहुरि मिलै नहीं, ऐसैं लेहु बिचार ॥८॥ 
लोक में हम देखते हैं कि दही को मथ कर उसमें से घृत(मक्खन) निकालने के बाद, शेष बचे तक्र में वह घृत पुनः मिलाना चाहें तो नहीं मिलता; इसी प्रकार चिन्तन द्वारा एक बार लौकिक सम्पर्कों से पृथक् होने के बाद पुनः उन में लिप्त होना या आसक्त होना उत्तम साधक के लिये असम्भव हो जाता है ॥८॥
(क्रमशः) 

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