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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ५/८*
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सुन्दर जागत भींत महिं, लिख्यौ जगत चित्रास ।
स्वप्न घौंट सनमुख भई, दृसैं सकल घट नास ॥५॥
१. अवस्था का अन्य भेद : श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिस किसी पुरुष ने अपनी जाग्रत् अवस्था में दीवाल पर कोई सांसारिक चित्र बनाया हो । वही चित्र उस की स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था में उस को लुप्त हुआ दिखायी दे । इसी प्रकार हमें यह सम्पूर्ण जगत् भासता है ॥५॥
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चित्र कछू नहिं देखिये, जबहिं अंधेरौ होइ ।
सुन्दर सुषुपति मैं गये, जाग्रत स्वप्ना दोइ ॥६॥
इसी प्रकार, वह चित्र हम को अन्धकार में भी नहीं दिखायी देता है । इस से स्पष्ट है कि संसार की दो स्थितियाँ दिखायी देती हैं - जाग्रत अवस्था में अन्य, और स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्था में अन्य ॥६॥
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तीन अवस्था तैं जुदौ, आतम ब्योम समान ।
भीति चित्र पुनि घौंट तम, लिप्त नहीं यौं जान ॥७॥
इस तरह, एक ही चित्र तीन प्रकार का दिखायी देता है - (क) कभी आकाश के समान स्वच्छ दिखायी देता है, (ख) कभी अन्धकार में लुप्त और पुनः स्पष्ट दिखायी देता है, (ग) और कभी स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में पूर्णतः लुप्त दिखायी देता है ॥७॥
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सुन्दर जाग्रत धूप है, स्वप्न जौन्ह ज्यौं जानि ।
दोऊ माहैं देखिये, रूप सकल पहिचानि ॥८॥
२. अवस्था का अन्य भेद : वही चित्र (क) दोपहर की धूप में दूसरे प्रकार का दीखता है और (ख) चान्दनी रात में दूसरे प्रकार का । इस प्रकार एक ही रूप दो अवस्थाओ में दो प्रकार से दिखायी देता है । यहाँ धूप को जाग्रत् अवस्था समझो और चान्दनी रात को स्वप्न अवस्था ॥८॥
(क्रमशः)

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