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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२५. अवस्था कौ अंग १/४
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एक अंग सो आतमा, सुंन अवस्था तीन ।
सुंदर मिलि करि बांचिये, न्यारे न्यारे कीन ॥१॥
अवस्था का निरूपण : अङ्कशास्त्र(गणितविद्या) में प्रसिद्ध एक(१) सङ्ख्या को आत्मा समझिये तथा वहाँ वर्णित शून्य(०) को तीन अवस्था समझिये । यदि उस शून्य को एक से पृथक् पृथक् सम्पृक्त किया(साथ लिखा) जाय तो वे पढने पर पृथक् पृथक् तीन सङ्ख्या दिखायी देंगीं ॥१॥
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एक सुंन मैं दस भये, दूजी सत ह्वै जाहिं ।
तीजी सुंन सहस्त्र ह्वै, एक बिना कछु नाहिं ॥२॥
जैसे - एक के आगे एक शून्य लगा दिया जाय तो वह १०(दश) पढा जायगा । यदि वहीं एक के आगे दो शून्य लगा दिये जाय तो वही १००(एक सौ) पढ़ा जायगा । और उस एक के आगे तीन शून्य लगाये जाँय तो वह १००० अर्थात् एक हजार पढा जायगा ।
यहाँ एक आश्चर्य यह भी है कि यदि इन सङ्ख्याओं में से(पहले लगे हुए) एक को हटा दिया जाय तो वह सङ्ख्या निरर्थक हो जायगी । (इसी प्रकार इस देह में से एक आत्मा निकल जाय तो यह देह भी सर्वथा निरर्थक हो जायगा !) ॥२॥
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सुंन सुंन दस गुन बधै, बहु बिधि ह्वै बिस्तार ।
सुंदर सुंन मिटाइये, एक रहै निरधार ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे उस एक सङ्ख्या के आगे एक शून्य लगा दिया जाने से उस का व्यावहारिक मूल्य दश गुणा बढ जाता है, वैसे ही उस शून्य को बढ़ाते हुए सङ्ख्या का यथेच्छ विस्तार कर सकते हैं; परन्तु उस शून्य को हटा दिया जाय तो वहाँ एक की सङ्ख्या निराधार(आलम्बनरहित स्वतन्त्र हो जाती है ।) वैसे ही जड प्रकृति(शून्य) को हटा देने से यह चेतन परमात्मा एकाकी(स्वतन्त्र) रह जाता है । (प्रकृति को जीतना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है ।) ॥३॥
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तीनि अवस्था मांहिं है, सुन्दर साक्षीभूत ।
सदा एकरस आतमा, ब्यापक है अनुस्यूत ॥४॥
इस देह में जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति - इन तीन अवस्थाओं के मध्य आत्मा केवल साक्षी का कार्य निष्पन्न करता है; क्योंकि वह आत्मा एक समान स्थिति में रहने वाला तथा सर्वव्यापक एवं सर्वत्र अनुस्यूत(ग्रथित = सम्बद्ध) है ॥४॥
(क्रमशः)

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