बुधवार, 13 मई 2026

वाही रे या वाही रे

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*नाना विधि के रूप धर, सब बांधे भामिनी ।*
*जग बिटंब परलै किया, हरि नाम भुलावनी ॥*
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*माया ॥*
वाही रे या वाही रे । तिहि का साध सबाया उगाही रे ॥टेक॥ 
जिहि मछिन्द्र कौ मुह मोड़्यौ रे । जिहि संग ब्रह्मा दौड्यौ रे ॥
जिहि कै पारासुर रंगि राच्यौ रे । जिहि कै आगै ईसर नाच्यौ रे ॥
सींगी रिषि सक्यौ न नासी रे । ल्याइ घालि गला मैं पासी रे ॥
करता नैं घर बारी रे । नारद थैं कीयौ नारी रे ॥
छत्रपति भूपति लोई रे । इहिं स्यूँ राचि रह्यौ सब कोई रे ॥
या सबही का मन मांही रे । इहि नैं कोइ भूलै नांहीं रे ॥
छह दरसन मनि भाई रे । भेट भाव ले आई रे ॥ 
कोई कोई ऊबरिया रे । ज्याँह रामचरण चित धरिया रे ॥
लाधी लखी पिछाणी रे । पणि बखनैं मौड़ी जाणी रे ॥११८॥
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स्थूल माया के कई रूप हैं जिनमें से कनक और कामनी दो प्रमुख हैं ।
“आडा हरि की भगति मैं, कनक कामणी दोइ । 
रामचरण निरणौं कियौ, कनक अपरबल जोइ ॥” 
बषनांजी ने माया के प्रमुख रूप कनक का वर्णन पिछले पद में कर दिया ।  अब इस पद में कामिनी रूपी माया का वर्णन करते हैं । वे कहते हैं । यह कामिनी रूपी माया वही है, निश्चय ही वही है जिसको एक बार साध = साध लेने पर = अंगीकृत कर लेने पर कोई भी छोड़ नहीं पाते, उल्टे सवाया = ज्यादा से ज्यादा उसी में उगाही = अवगाहन = निमग्न हो जाते हैं । 
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मैं बषनां इस बात को योंही मनगढंत नहीं कह रहा हूँ । इससे सम्बन्धित इतिहास-पुराणों में अनेकों प्रसंग लिखे पड़े हैं । उनमें से दो चार का दिग्दर्शन यहाँ कराया जाता है । इस कामिनी ने ही कामरूपक्षेत्र में मत्स्येन्द्रनाथ का योगसाधना से मुँह मुड़ाकर अपने में अनुरक्त कर लिया था । इस कामिनी ने ब्रह्मा को इतना कामातुर बना दिया था कि उसने अपनी पुत्री सरस्वती को ही अपनी पत्नी बना डाला । 
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इस कामिनी के रंग में ही पाराशर ऋषि रंग गये । इस कामिनी के आगे ही ईसर = शिव ने नृत्य किया था । श्रृंगीऋषि जिन्हें ‘स्त्री’ नाम तक पता नहीं था को भी इस कामिनी ने अछूता नहीं छोड़ा और उन्हें भी जंगलों से निकालकर अपने आकर्षण रूपी रस्सी में बांधकर अपने निकट ले आई । कर्त्ता को भी इसने घरबारी = गृहस्थ बनाकर उससे भी प्रधान हो गई । इसीलिये पहले लक्ष्मी फिर नारायण बोला जाता है । 
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नारद को इसी नारी ने बंदर बनने को बाध्य किया था । क्या छत्रपति क्या राजा और क्या सामान्य जनता, सभी इसी में रचे-पचे पड़े हैं । सभी इसके अधीन हुए पड़े हैं  । यह इतनी प्रबल आकर्षणमयी है कि यह सभी के मनों में बसी हुई है । इसको कोई भी भूलता नहीं है । षड्दर्शनियों के मनों को भी यह प्रिय लगती है । वे भी इसको प्राप्त करने को लालायित रहते हैं । यह इन षड्दर्शनियों को दर्शन(भेंट) और श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने के बहाने जाकर प्रभावित करती है । 
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जिन्होंने अपने चित्त में रामजी के चरणों को धारण कर लिया है वे ही कोई-कोई इससे बच सके हैं । बषनांजी स्वयं के बारे में बताते हैं मैंने भी पत्नी लाधी = प्राप्त की, लखी = फिर उसको भोगा और अंत में गुरु के आलोक में उसके वास्तविक स्वरूप को पहचाना कि यह स्वात्मतत्व साक्षात्कार के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है । किन्तु यह तत्व मेरे जानने में बहुत बाद में आया । 
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“काम अपरबल जोड़ बोध सबहिन का खोया । 
ब्रह्मा की बुधि हरी काम हित पुतरी जोया ॥ 
सिवकी अकलि भुलाइ भीलड़ी पाछै भागा । 
सुरपति सरति चुकाइ जाइ गौतम घरि लागा ॥ 
सीतापति सूँ तोड़ि काम रावण घर बोयौ । 
देखि मछोदरि रूप काम पारारिषि मोह्यौ । 
छत्रपति क्या नरपति जारि सकै नहिं देव । 
रामचरण कंद्रफ जरै राम भजन गुरदेव ॥”
“नारी नर छोड्या नहीं तीनूं लोकि मंझारि । 
केता घाइल करि रख्या केता लीया मारि ॥ 
बिसन संगि लछमीं भई विधि सावत्री नारि ॥ 
भई महेस घरि गवरिज्या सेस नागणी घारि । 
सींगी रिषि कौं मोहियौ कहीं न चाली हारि । 
रिषि तपसी छोडै नहीं मारै जीती सारि ॥ 
बन बसती हसती फिरै नरां घालती घाव । 
रामचरण जन राम रत जा परि चलै न दाव ॥११८॥”

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