🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*संझ्या चलै उतावला, बटाऊ वन-खंड मांहि ।*
*बरियां नांहीं ढील की, दादू बेगि घर जांहि ॥*
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*सुमिरण-विधि ॥* साषी लापचारी की ॥१(१ इस साषी का अर्थ ‘सुमिरण कौ अंग’ में देखें ।)
कौडी रमतौ डाबड़ौ डरतौ सास न लेइ ।
बषनां साहिब तौ मिलै, यौं लै चरणाँ देइ ॥
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पद
अैसैं मना रे अैसैं मना । जहाँ चलौ साहिब अपना ॥टेक॥
बालबुधि ज्यूँ कौडी देइ । रिधि नैं डरता सास न लेइ ॥
ज्यूँ साचा सर लेनैं जाइ । जल थैं डरता बिलम न लाइ ॥
ज्यूँ पंथी पँथ मांहीं डरै । घर है दूरि रैंणि जिनि परै ।
अैसैं दौरि पहूँचनि करै । तौ बषनां सब कारिज सरै ॥११२॥
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जीव को प्रबोधित करते हुए कहते हैं, हे जीव ! मन को इस प्रकार संचालित कर, उसकी वृत्ति को उस राह पर चला जिस पर चलने से अपना साहिब निजस्वरूप परमात्मा का बोध = साक्षात्कार होता है । जिस प्रकार बालकबुद्धि अपरिपक्व बुद्धि वाले बालक को कोई एक कौड़ी दे देता है तो वह उसे बड़े यत्न से कहीं छिपाकर रखता है तथा उसके होने के बारे में एक श्वास भी न लेता है, किसी को कुछ भी नहीं बताता है ।
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जैसे मरजीवा = गोताखोर साचा मोती को निकालने के लिये सर = तालाब, कूपादि में उतरता है और जल में अधिक समय तक रहने के कारण श्वास रुक न जाये इस भय से उस बहुमूल्य पदार्थ को ढूंढने में जरा भी देरी नहीं करता है ।
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जिस प्रकार पंथ में चलता हुआ पंथी चलने में डरता हुआ शीघ्रता इसलिये करता है कि मेरा घर दूर तथा रास्ता लम्बा है, कहीं रात्रि न हो जाये अन्यथा अनजान रास्ते में ही कहीं रुकना पड़ जायेगा जो खतरे से खाली नहीं होगा । इस प्रकार सोचकर वह पंथी शीघ्र चलकर गंतव्य पर पहुँचता है ।
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बषनां कहता है, जो उक्त प्रकार से लक्ष्यारूढ़ होकर अनन्यभाव से लगातार संसार में निर्लिप्तभाव से रहते हुए रामजी का नाम स्मरण करता है, उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । अर्थात् उसका लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं ॥११२॥

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