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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तिल तिल का अपराधी तेरा, रती रती का चोर ।*
*पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥*
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*विनती ॥*
बहुगुण तेरा औगुण मेरा, जे देखौं तौ खोटा हो ।
दोस किसा द्यौं परखणहारै, जे आढ आपणा खोटा हो ॥टेक॥
मेघ जु बरसै बारामासी, चात्रिग प्यास न भागी हो ।
कर्म छत्र मेरा माथा ऊपरि, ताथैं बूंद न लागी हो ॥
सर्व लोक मैं भया उजाला, एक तमासा अैसा हो ।
जे घूघू कौं सूझै नांहीं, तौ दिन कौं दूसण कैसा हो ॥
भार अठारा कूँपल मेल्है, सदा रहै बन मांहीं हो ।
पान करीर न लागै कोई, तौ रिति कौं दूषण नांहीं हो ॥
जै दूखौं तौ औगुण मेरा, तौ गुण तेरा चिति आवै हो ।
तूँ औगुण का मेटणहारा, ताथैं बषनौं गावै हो ॥१२२॥
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हे परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ! तुझमें अनंतानंत गुण हैं जबकि मुझमें अवगुण ही अवगुण भरे पड़े हैं । जब मैं मेरे अन्दर झाँककर देखता हूँ तो मैं अपने आपको सर्वथा अवगुणी ही पाता हूँ ।
“मैं अवगुण का पूतला, तुम गुणवन्ताँ राम ।
औगुण दिसी निहारियौ, तौ तीन लोक नहिं ठाम ॥”
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हे परमात्मन् ! बताइये जब मैं स्वयं ही अवगुणी हूँ तब आप भी मुझे अवगुणी कहें और मानें तो मैं दोष आपको कैसे दे सकता हूँ क्योंकि कमी तो मुझ स्वयं ही में है । जैसे अपने स्वयं का आढ = सिक्का ही खोटा हो तो परखने वाले जौहरी को मैं कैसे दोष दे सकता हूँ कि उसको सिक्का परखना नहीं आता । एक आश्चर्यजनक बात और बताता हूँ ।
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सूर्योदय होने के साथ ही सारे ब्रह्मांड में उजाला हो जाता है किन्तु उल्लू को उस विराट् प्रकश में भी कुछ नहीं दीखता है । तो क्या इस आधार पर प्रकाश को दोषी ठहराया जा सकता है । नहीं । क्योंकि दोष प्रकाश का नहीं उल्लू स्वयं का है जिसको उजाले में दीखता ही नहीं है ।
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इसी प्रकार, जो वृक्ष, पौधे, जंगलों में, खेतों में होते हैं वे सभी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार अपनी-अपनी ऋतुओं में नये-नई पत्ते धारण करते हैं जिनका वजन करने पर अठारा भार होता है किन्तु करीरी = कैर के वृक्ष के पत्ते लगते ही नहीं है तो क्या इसके लिये ऋतु को दोषी ठहराया जा सकता है । नहीं । क्योंकि कैर के वृक्ष के पत्ते लगते ही नहीं हैं ।
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अतः हे परमात्मन् ! यदि मैं दुखित हूँ तो अपने अवगुणों के ही कारण हूँ । इसमें तेरा कोई दोष नहीं है । तू गुणवान है । अकारण दयालु है । अतः मुझे बार-बार तेरे गुण स्मरण हो आते हैं कि तू अवगुणों को मिटानेवाला है । तेरा स्मरण करते रहने से तू किसी न किसी दिन मेरे अवगुणों को नष्ट कर देगा । इसीलिये मैं बषनां दिन-रात तेरे गुणों का गान करता रहता हूँ ॥१२२॥

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