🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान ।*
*सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥*
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*गुरुमहिमा ॥*
दीन कौ दयाल दादू कब मिलै मोहि ।
जिसी घड़ी हूँ तुझै देखौं, मुझकौं सुख होहि ॥टेक॥
तरवर रूप फल अनूप, पंथी टालन घाम ।
सब काहू परि छाया करणा, पँखियाँ कौं विश्राम॥
आंधा केरी आँखड़ी, पांगुलाँ का पाव ।
पैली पार उतारिणहारा, भौसागर की नाव ॥
जा सँगि बहै मुकति कौ मारग, निरभै को भै नांहि ।
जाकौ ग्यान नीसरणी, चढ़ि साधू जन जांहि ॥
पारस रूप तत्त अनूप, परस्याँ पलटै भाव ।
दरसन परि बषनौं बलिहारी, बंदि छुड़ावणहार ॥१३०॥
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बषनांजी कहते हैं, दीनों पर दया करने वाले दादूजी महाराज मुझे कब मिलेंगे । जिस क्षण मैं दादूजी महाराज को देखूँगा उसी समय मुझे सुख होगा । वे दादूजी महाराज वृक्ष रूप है जिसमें भक्ति-मुक्ति रूपी अनुपम फल लगते हैं । वह पंथी रूपी साधकों को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य रूपी शीतल, मंद और सुगंधित छाया रूपी साधना की प्रक्रिया प्रदान करते हैं ।
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वे पात्रापात्र का बिना विचार किये सभी को भगवद्भक्ति रूपी छाया प्रदान करते हैं तथा परम भगवद्भक्त रूपी पक्षियों को अपने सान्निध्य में विश्राम = रहने का अवसर भी प्रदान करते हैं । वस्तुतः वे अंधों के लिये लकड़ी के समान हैं तथा पंगुओं के लिये पावों के समान हैं । भवसागर के दूसरे किनारे तक ले जाने के लिये वे नाव के समान हैं ।
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जिसका संग करने से संगकर्ता भयमुक्त = विघ्न बाधाओं से भरे मार्ग पर भी निर्भय हुआ चलकर मुक्ति के मार्ग पर निष्कंटक चलता है और जिसका ज्ञान नीसरणि = सीढ़ी रूपा है जिसपर चढ़कर साधु = साधक जन मुक्त हो जाते हैं । दादूजी महाराज अनूपम पारस तत्व रूप हैं जिनके संग से लोहा रूपी संसारी जीव पलटकर कंचन रूपी भक्त बन जाते हैं । मैं बषनां उन बंधनों को काटने वाले दादूजी महाराज के दर्शनों पर न्यौछावर होता हूँ ॥१३०॥

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