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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४९/५१*
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निदिध्यास एकादशी, पुनि द्वादशी बदंति ।
आगै होइ त्रयोदशी, चतुर्दशी पर्यंति ॥४९॥
निदिध्यासन : तब एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं चतुर्दशी तिथि में 'निदिध्यासन' द्वारा ज्ञान कला का विस्तार आगे से आगे बढता जाता है ॥४९॥
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तदाकार पूरन कला, पूरनमासी होइ ।
पूरन ज्ञान प्रकाश शशि, भ्रम संदेह न कोइ ॥५०॥
पूर्णिमा तिथि में उस चन्द्रमा के आकार(मण्डल) को पूर्ण करने वाली कला उद्भूत होती है, तब उस आत्मा रूप चन्द्रमा में ज्ञान का प्रकाश भी पूर्णतः उद्भूत होता है । और उस में किसी प्रकार का द्वैत भ्रम या कोई सन्देह नहीं रह जाता ॥५०॥
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ताहि कहत हैं ब्रह्मबिदु, शास्त्र बेद पुरांन ।
सुन्दर या अनुक्रम बिना, और सकल अज्ञांन ॥५१॥
ब्रह्मवित् : ऐसे ही आत्मज्ञानी को विविध शास्त्रों, वेदों एवं पुराणों में ब्रह्म का ज्ञाता(ब्रह्मवित्) कहा गया है । शेष संसार तो अज्ञान का भण्डार है ॥५१॥
(क्रमशः)

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