शुक्रवार, 8 मई 2026

निकमौं बैठौ नाँव ले नांहीं

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू देह जतन कर राखिये, मन राख्या नहीं जाइ ।*
*उत्तम मध्यम वासना, भला बुरा सब खाइ ॥*
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*मन ॥* 
निकमौं बैठौ नाँव ले नांहीं । औरै घाट घड़ै घट मांहीं ॥टेक॥
कुबधि कुदाली घट ही मांही । कूप खणैं पड़िबा कै ताँई ॥
घट मैं झाँखै आल जंजाल । कबहुँक पाताँ कबहुँक डाल ॥
घट मैं घड़ै जिसी ही बात । जिन बातनि थैं नरकहिं जात ॥
कहींक जाइ कहीं की आणैं । गली पांगली सबही जाणैं । 
घाट घडंताँ ही दिन जावै । बषनां हरि गुण कबहुँ न गावै ॥११३॥ 
जो मनुष्य मन के अधीन हैं, उनको मन रूप मानते हुए बषनांजी कहते हैं । मन रूपी निकम्मा मनुष्य स्थिर होकर परमात्मा के नाम का स्मरण तो नहीं करता है उल्टे बैठा-बैठा मन में नाना प्रकार के खयाली संकल्प-विकल्प करता है । 
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कुबुद्धि रूपी कुदाली भी शरीर के अंदर ही मन की सहायता करने को तत्पर रहती है जिसके सहकार से नाना सकाम-कर्म =बंधनकारीकर्म रूपी कूप को गिर पड़ने के लिये खोदता है = नरक में जाने के लिये नाना रागयुक्त सकाम-कर्म करता है । मन में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्पों को करने में ही झांखै = व्यस्त रहता है । कभी सूक्ष्मविषयों के चिंतन और कभी स्थूल विषयों के चिंतन में लगता है । 
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वस्तुतः मन में मनुष्य जिन सांसारिक बातों के बारे में चिंतन-मनन करता है उनसे चित्त विषयाकार होने से वह नरकों में ही जाता है । मन इतना चंचल है कि जाता कहीं है और खबर कहीं की लाता है । अर्थात् संलग्न किसी एक विषय पर किया जाता है किन्तु बिना पूरा किये ही वह दूसरे कार्य को करने लग जाता है । 
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मन इतना सूक्ष्म है कि उसकी गति प्रत्येक स्थान, गली-कूँचे में है । अर्थात् वह हर विषय में अपने आपको नियोजित कर लेता है । मन का सारा समय व्यर्थ के नाना संकल्प-विकल्प करने में ही चला जाता है किन्तु काम आने वाले हरि के नाम-गुणों का चिंतन-स्मरण कभी भी नहीं करता है ॥११३॥

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