गुरुवार, 7 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ४९/५२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४९/५२*
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*रज्जब ज्वाला विरह की, कबहूं प्रकटे मांहि ।*
*तो सींचो घृत सौचसौं, कर्म काष्ट जरि जाँहिं ॥४९॥*
हृदय में कभी विरहाग्नि की ज्वाला प्रकट हो जाय, तो उसे भगवद्-वियोगजन्य संताप रूप घृत से सींचना चाहिये । ऐसा करने से कर्म रूप काष्ठ जल जायेंगे और निष्काम होकर निष्कर्म ब्रह्म को प्राप्त हो जाओगे ।
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*अठार भार विधि आदमी, बिरही बंस विशेष ।*
*हरे हुताशन हरि प्रकट, रज्जब अचरज देख ॥५०॥*
अन्य मानव तो संपूर्ण वनस्पतियों के समान हैं और भगवद्-विरही विशेष करके बांस के समान है । जैसे बाँस में अग्नि प्रकट होकर बाँस को जलाता है, तब वह प्रथम से सुन्दर हो जाता है वैसे ही विरही के हृदय में ज्ञान रूप में हरि प्रकट होकर उसके अज्ञान को जला देते हैं फिर वह आश्चर्य रूप अपने स्वरूप को देखता है ।
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*पंख पटम्बर पिण्ड परि, माँहिं पपीहे प्राण ।*
*जन रज्जब दोऊ दहै, दिली दोस्त बिन जान ॥५१॥*
ताप से बचने के लिये चातक पक्षी के शरीर पर पंख और विरही के शरीर पर श्रेष्ठ वस्त्र होते हैं, तो भी चातक का मन अपने दिली प्रेमी स्वाति बिन्दु के अभाव में और हरि-विरही का मन अपने दिली मित्र हरि दर्शन के अभाव में जलता रहता है यह सत्य ही जानो ।
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*साधू सारस शोक की, स्वांग रहित सत शूल ।*
*जन रज्जब जग जुगल बिन, त्यागैं जीव सु मूल ॥५२॥*
संत और सारस पक्षी दोनों के सुन्दर भेष न होने पर भी उनकी विरह जन्य शोक की पीड़ा सत्य होती है । सारस अपनी जोड़ी के पक्षी बिना अपने जीवन के मूल प्राणों को त्याग देता है और संत अपने प्रभु के दर्शन बिना जगत् में नहीं रहना चाहता अपने प्राणों का त्याग कर देता है ।
(क्रमशः) 

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