🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
*२५. अवस्था कौ अंग ३७/४०*
.
दूजौ रहै समुद्र मैं, सीस दिखावै आइ ।
पूछै बोलै बचन कौं, फेरि तहां छिपि जाइ ॥३७॥
दूसरा(वरीयान्) सिद्ध यद्यपि अधिक समय ब्रह्मामृत समुद्र में ही गोता लगाने में व्यतीत करता है; परन्तु कभी कभी उसमें से निकलकर किसी विशिष्ट जिज्ञासु की ब्रह्मविषयक जिज्ञासा भी शान्त करता है, तदनन्तर वह पुनः उसी ब्रह्मसमुद्र में गोता लगाने लगता है ॥३७॥ (२)
.
ब्रह्मानंद समुद्र तैं, तीजौ निकसै नांहिं ।
गहरै पैठौ जाइ कै, मगन भयौ ता मांहिं ॥३८॥
तृतीय(वरिष्ठ) सिद्ध ब्रह्मानन्द समुद्र से बाहर कभी निकलता ही नहीं । वह तो निरन्तर(जीवनपर्यन्त) उसी ब्रह्मानन्द समुद्र में ही गोता लगाये रहता है और उसी में मग्न रहता है ॥३८॥ (३)
.
अष्टावक्र वसिष्ट मुनि, प्रगट कियौ निज ज्ञांन ।
क्रम ही क्रम उपदेश करि, कीये ब्रह्म समांन ॥३९॥
उदाहरण : इन त्रिविध सिद्धों में प्रथम(वर) सिद्ध के लिये अष्टावक्र एवं वसिष्ठ ऋषि का उदाहरण दिया जा सकता है; जिन ने स्वरचित ग्रन्थों द्वारा जनसामान्य को ब्रह्मज्ञान का क्रमिक उपदेश कर उनमें से बहुतों को ब्रह्म कोटि में पहुँचा दिया ॥३९॥
.
दत्तात्रय शुकदेवजी, बोले बचन रसाल ।
नृपति परीक्षत भूप जदु, मुक्त किये ततकाल ॥४०॥
द्वितीय(वरीयान्) प्रकार के सिद्धों में दत्तात्रेय एवं शुकदेव की गणना होती है । इनमें से शुकदेव ने राजा परीक्षित को, एवं दत्तात्रेय ने जदु को ब्रह्मज्ञान का ऐसा गम्भीर उपदेश किया कि वे तत्काल मुक्त हो गये ॥४०॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें