गुरुवार, 28 मई 2026

२६. बिचार कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. अथ बिचार कौ अंग १/४
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सुन्दर साधन सब थके, उपज्यौ हृदय बिचार । 
श्रवन मनन निदिध्यास पुनि, याही साधन सार ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब हमारे द्वारा किये जा रहे भगवत्-साक्षात्कार साधना के सभी उपाय निष्फल हो गये, तब हमारे हृदय में यह विचार उद्भूत हुआ कि श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन द्वारा निराकार निरञ्जन प्रभु का चिन्तन ही उस की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ॥१॥
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सुन्दर या साधन बिना, दूजौ नहीं उपाइ । 
निस दिन ब्रह्म बिचार तें, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ॥२॥
इस साधना के विना भगवत्प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है । यदि इस उपाय से निरन्तर ब्रह्मचिन्तन किया जाय तो जीव-ब्रह्म की एकता सहजता से सुलभ हो सकती है ॥२॥
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सुन्दर एक बिचार है, सुरझावन कौं सूत । 
उरझि रह्यौ संसार मैं, नखशिख प्रानी भूत ॥३॥
यही एकमात्र उपाय ऐसा है जिससे जन्म-मरण परम्परा की यह उलझी हुई समस्या का सरलता से समाधान हो सकता है । नख से शिखा तक संसार के विषयभोगों में डूबा हुआ प्राणी इसी उपाय से मुक्त हो सकता है ॥३॥
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उपजै एक बिचार जब, तब यह पावै ठौर । 
भरमावन कौं जगत महिं, सुन्दर साधन और ॥४॥
जब किसी भाग्यवान् प्राणी को यह विचार(भगवच्चिन्तन) रूप उत्तम उपाय सूझता है तभी यह प्राणी उस निरञ्जन निराकार प्रभु तक पहुँच सकता है । अन्यथा इस जगत् में विभिन्न मतवादियों ने, उस प्राणी को बहकाने के लिये, अपना अपना मत प्रतिपादन करते हुए, नाना भ्रमजाल फैला रखे हैं ॥४॥
(क्रमशः) 

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