शुक्रवार, 22 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ३३/३६*
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बर सौ जीवनमुक्त है, तुरिया साक्षीभूत । 
लिपै छिपै नहिं सब करै, अनकरता अवधूत ॥३३॥
वर(उच्च) उस ज्ञानी पुरुष को कहते हैं जो जीवन्मुक्त१ हो चुका है । तथा जो तुर्यावस्था को अतिक्रान्त कर साक्षीभूत अवस्था में पहुँच चुका हो । जो सब कुछ करता हुआ भी लोक व्यवहार में कहीं आसक्त या लिप्त नहीं होता । तथा उस का समस्त व्यवहार अवधूत के समान होता है ॥३३॥ 
(१ जीवन्मुक्त अवधूत के लक्षण :
क्लेश-पाश-तरङ्गाणां कृन्तनेन विमुण्डनम् ।
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सोऽवधूतोऽभिधीयते ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ८३
गते न शोकं विभवे न वाञ्छां, प्राप्ते न हर्षं न करोति योगी ।
आनन्दपूर्णो निजबोधलीनो न बाध्यते कालपथेन नित्यम् ॥ 
सि० सि० प०, पृ० ९७)
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महा मुक्त अक्रिय सदा, सो कहिये बरियान । 
तुरिया तुरियातीत कै, मध्य कहैं सज्ञान ॥३४॥
वरीयान्(उच्चतर) सिद्ध उसे कहते हैं जो लौकिक व्यवहारों से सर्वथा मुक्त हो, तथा लौकिक वैदिक कर्मों का भी सर्वथा त्याग कर चुका हो । इसकी स्थिति ज्ञानियों ने तुर्य एवं तुर्यातीत के मध्य बतायी है ॥३४॥
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जाकी गति न लखि परै, सो कहिये जु बरिष्ट ।
तुरीयातीत परातपर, बचन परै उतकृष्ट ॥३५॥
तथा वरिष्ठ(उच्चतम) सिद्ध उसे कहते हैं जिस की क्रियाओं को पहचाना या समझा न जा सके । वह तुर्यातीत, परात् पर(ब्रह्म) के विषय में उत्कृष्ट वचन बोलता है ॥३५॥
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ब्रह्म समुद्र जहां तहां, ता महिं तीनौं लीन । 
एक किनारे आइ करि, सब कौं सिक्षा दीन ॥३६॥
यद्यपि ये तीनों ही प्रकार के सिद्ध निरन्तर ब्रह्मामृत समुद्र में गोता(डुबकी) लगाये रहते हैं; परन्तु उनमें से एक(वरसिद्ध) प्रायः किनारे(लोक में) आकर सामान्य जन को ब्रह्म की शिक्षा(ब्रह्मविषयक ज्ञान) भी देता रहता है ॥३६॥ (१)
(क्रमशः)

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