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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ९/१२
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जैसैं जल महिं कंवल है, जल तैं न्यारौ सोइ ।
सुन्दर ब्रह्म बिचार करि, सब तैं न्यारौ होइ ॥९॥
या इस रूप से सोचिये कि जैसे कमल जल में रहता हुआ भी व्यवहार में उससे पृथक् ही रहता है; ऐसे ही उत्तम जिज्ञासु प्राणी, ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, संसार से अपना पृथग्भाव बनाये रख सकता है ॥९॥
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मनि अहि कै मुख मैं सदा, बिष नहिं लागै ताहि ।
सुन्दर ब्रह्म बिचारि तैं, सब सौं न्यारौ आहि ॥१०॥
लोक में हम देखते हैं कि विषधर सर्प के मुख में मणि रहने के कारण, उस सर्प पर अपने विष का कोई प्रभाव नहीं होता; इसी प्रकार, उत्तम जिज्ञासु, निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करता हुआ, अपने को लोकासक्ति से बचाये रखे ॥१०॥
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सुन्दर एक बिचार तैं, सुख दुख होइ समांन ।
राग दोष उपजै नहीं, तजै मान अपमांन ॥११॥
यदि हम एकमात्र ब्रह्मचिन्तन करते रहें तो हमारे लिये सुख-दुःख को सहन करना एक साधारण बात हो जायगी, राग द्वेष से भी हम दूर हो जायेंगें, तथा लौकिक मान अपमान का भी हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ॥११॥
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सुन्दर एक बिचार सौं, बुद्धि तजै नानत्व ।
जानै एकै आतमा, उपजै भाव समत्व ॥१२॥
जो जिज्ञासुभक्त निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करने लगेगा, तो शनैः शनैः उसकी बुद्धि का जगद्विषयक नानात्व भ्रम स्वतः मिट जायगा । साथ ही वह सभी प्राणियों में एक ही आत्मा समझता हुआ सर्वत्र समबुद्धि भी हो जायगा ॥१२॥
(क्रमशः)

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