सोमवार, 25 मई 2026

*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*२५. अवस्था कौ अंग ४५/४८*
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मावस अति अज्ञान कै, निसा अंधेरी कीन । 
ससि आतमा दृसै नहीं, ज्ञान कला करि हीन ॥४५॥
६. अवस्था का अन्य भेद : ४५ से ५१ तक की साषियों द्वारा महात्मा श्रीसुन्दरदासजी ने एक अवस्थाभेद १५ तिथियों में चन्द्रमा के प्रकाश के अनुक्रम-व्यतिक्रम के उदाहरण से समझाया है । इसमें अमावस्या को सुषुप्ति अवस्था(अज्ञान) के समान, प्रतिपदा से दशमी तक अल्प प्रकाश को स्वप्न अवस्था के समान तथा एकादशी से पूर्णिमा तक वर्धमान प्रकाश को जाग्रत् अवस्था बताया गया है ॥४५॥
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है अज्ञान अनादि कौ, जीव पर्यौ भ्रम कूप । 
श्रवन मनन निदिध्यास तें, सुन्दर ह्वै चिद्रूप ॥४६॥
यह अज्ञान अनादि माना गया है । यह जीव भ्रमरूप गहरे गर्त में गिरा हुआ है । जब वह(गुरु उपदेश का) श्रवण मनन एवं निदिध्यासन करता है तभी वह स्वकीय चिद्रूप को समझ पाता है ॥४६॥
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श्रवण सु कहिये प्रतिपदा, ज्ञान कला दरसाइ । 
दुतिया तृतिया चतुर्थी, सुनि पंचमी दिखाइ ॥४७॥
श्रवण : इन तीनों में, प्रतिपदा तिथि को 'श्रवण' माना जा सकता है जिसमें ज्ञान की प्रथम कला उद्भूत होती है । द्वितीया, तृतीया एवं चतुर्थी तथा पञ्चमी तिथि में श्रवण द्वारा उसी ज्ञानकला में वृद्धि होती है ॥४७॥
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मनन किये षष्टी दृसै, अर्थ लेइ पहिचांनि । 
होइ सप्तमी अष्टमी, नवमी दशमी जांनि ॥४८॥
मनन : षष्ठी तिथि में 'मनन' को माना जा सकता है जब जिज्ञासु गुरुपदिष्ट के वाच्यार्थ की वास्तविकता पहचान लेता है । तब सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं दशमी तिथि को इसी मनन के द्वारा ज्ञानकला का विस्तार होता है ॥४८॥
(क्रमशः) 

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