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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २९/३२
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पावक लोह तपाइये, होइ एकई अंग ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया संग ॥२९॥
जैसे लोह के दो खण्डों को अग्नि से अत्यधिक तपाया जाय तो प्रयास करने पर वे दोनों खण्ड एक हो(मिल) जाते हैं; वैसे ही यह आत्मा भी, देह में अतिशय आसक्ति के कारण, देह से मिला हुआ दीखता है ॥२९॥
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चोट परै घन की जबहिं, पावक भिन्न रहाइ ।
सुन्दर दीसै प्रगट हौ, लोहा बधता जाइ ॥३०॥
जब उष्ण लोह पर घन की चोट पड़ती है तो हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि अग्नि चमक कर उस से पृथक् हो जाती है और न्यूनता या वृद्धि आदि लौह में आती हैं; उसी प्रकार रागादि विकार देह को ही होते हैं, आत्मा को नहीं ॥३०॥
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सुन्दर पावक एकरस, लोहा घटि बढि होइ ।
तैसैं सुख दुख देह कौं, आतम कौं नहीं कोइ ॥३१॥
जैसे वहाँ अग्नि सदा समस्थिति में रहने वाला है, हानि या वृद्धि लोह में ही होती है; वैसे ही ये शीत उष्ण, सुख दुःख भी देह को सताते हैं; आत्मा को नहीं ॥३१॥
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नीर क्षीर ज्यौं मिलि रहे, देह आतमा दोइ ।
सुन्दर हंस बिचार बिन, भिन्न भिन्न नहिं होइ ॥३२॥
जैसे दूध में जल मिला दिया जाता है वैसे ही देह में आसक्ति के कारण यह आत्मा उस से मिला हुआ दिखायी देता है । वहाँ जैसे किसी विवेकी हंस के विना कोई अन्य दूध को जल से पृथक् नहीं कर सकता; उसी प्रकार कोई ज्ञानी साधक ही इस देह से आत्मा को पृथक् रूप से जान सकता है ॥३२॥
(क्रमशः)

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