🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।*
*यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥*
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परिचय ॥ साषी लापचारी की ॥१ (१ इन साषियों का अर्थ ‘सुसंगति कौ अंग’ में देखें ।)
ज्यूँ तिल बास्या फूल सँगि, यौं हिरदै राम बसाइ ।
तौ बषनां त्याँह की बासना, जुग जाताँ नहिं जाइ ॥
तिल फूलाँ की बास लै, दुहूँ काठाँ बिचैं पिड़ाइ ।
यौं बषनां मन पीड़िये, तौ कबहूँ बास न जाइ ॥
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पद ॥ १
हिरदै राम बसाईला ।
फूलौं की बास तिलौं मैं आई, तिल फुलेल कहाईला ॥टेक॥
तेल बासना सभा सारी मैं, नासा परखि सराहीला ।
साध बासना दूरि दिसंतरि, महलि महलि महकाईला ॥
कोमल पुहुप बासना सूषिम, तिल मैं सहजि समाईला ।
अैसै हिरदैं राम हमारै, भाग बड़े सो आईला ॥
हरि हिरदै कस्तूरी डावै, अैसा भेद लखाईला ।
बषनां ज्याँ कस्तूरी बासी, तिहि डाबै बासना जाईला ॥११०॥
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बषनांजी आत्मसाक्षात्कार की अपनी स्थिति को बताते हुए कहते हैं, मेरे हृदय में रामजी बस गया है । जिसप्रकार फूलों की सुगंधि तैल में मिलकर या फूल तिलों के साथ पेरे जाने पर फुलेल = इत्र कहाने लगता है, ऐसे ही रामनाम की साधना द्वारा मेरे अंदर रामजी का निवास हो गया है और मैं नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मस्वरूप = रामजीस्वरूप अपने आपको अनुभव करने लगा हूँ ।
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तेल = फुलेल की सुगंधि सभा में लगाकर जाने पर सभाजनों द्वारा नासिका में सुगंधि आने पर सराही जाती है । इसीप्रकार रामनाम साधना की सुगंधि अथवा साधु-संतों की संगति की सुगंधि देश-देशान्तरों तक घर-घर को सुगंधित = राममय बना देती है । जिस प्रकार की कोमल पुष्पों की सूक्ष्म सुगंधि तिलों में सहज में ही समाहित हो जाती है । वैसे ही निःवासनामय मेरे हृदय में शुद्ध सच्चिदानंदमय राम बड़े भाग्य से प्रकट हो गया है ।
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मेरे हृदय को परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने उसीप्रकार सुगंधित कर दिया है जैसे डिब्बे को कस्तूरी सुगंधित कर देती है और परमात्मा मेरे हृदय में ठीक उसीप्रकार स्थाई रूप में बस गया है जैसे जिस डिब्बे में कस्तूरी रखी जाती है उसमें से उस कस्तूरी को निकालने के उपरांत भी उसकी सुगंधि कभी भी जाती नहीं है । जिसप्रकार डिब्बे में कस्तूरी की सुगंधि रहती है, ऐसे ही हृदय में रामजी रहते हैं, यह रहस्य मुझे ज्ञात हो गया है ॥११०॥

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