सोमवार, 1 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग १७/२०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १७/२० 
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इनि दुहुंवनि कै मध्य है, नव तत्वनि कौ लिंग । 
सुन्दर करै बिचार जब, उहै होत तब भंग ॥१७॥
लिङ्गशरीर : रूप और आत्मा के मध्य नौ तत्त्वों से निर्मित एक लिङ्गशरीर(कारण शरीर या सूक्ष्म शरीर) भी है । सुन्दरदासजी कहते हैं - जब विवेकपूर्वक चिन्तन किया जाय तो वह भी विनाशी ही ज्ञात होगा ॥१७॥
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पंच तत्व सौं मिलि रह्यौ, सूक्षम लिंग शरीर । 
सुन्दर एक बिचार बिन, चेतन मानत सीर ॥१८॥
यह सूक्ष्म शरीर भी पञ्च तत्त्व(पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से मिला हुआ है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - (अज्ञानावृत)आत्मा, विवेक न होने के कारण, इसमें आसक्ति कर लेता है ॥१८॥
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ज्यौं काहू कै रोग ह्वै, नाडी देखै बैद । 
सुन्दर अपनी सी कहै, वायु कियौ तन कैद ॥१९॥
अविवेकी वैद्य : जैसे किसी रोगी पुरुष को कोई वैद्य आकर(उसकी नाडी) देखे । वह अपनी बुद्धि के अनुसार, रोगी के शरीर को वात(वायु) रोग से युक्त बता दे ॥१९॥
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बहुरि बुलायौ जोतिषी, उन यह कियौ बिचारि । 
सुन्दर ग्रह लागै सबै, कीये पुन्य उबार ॥२०॥
अविवेकी ज्यौतिषी : पुनः वहाँ किसी ज्यौतिषी को बुलाया जाय । वह उस रोगी को, अपने विचार के अनुसार, अनेक दुष्ट ग्रहों से युक्त बतावे और कुछ पुण्य करने से ही उस के स्वास्थ्य की उन्नति बतावे ॥२०॥
(क्रमशः)

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