मंगलवार, 2 जून 2026

*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।*
*गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ॥*
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साधु महिमा ॥ साषी लापचारी की ॥१ 
(१. इन साषियों का अर्थ ‘गुरुदेव कौ अंग’ में देंखे ।)
बषनां बाणी बरसणी, बरसै गहर गँभीर ।
सूका नैं हरिया करै, गुर बाणी कौ नीर ॥
बषनां बाणी बरसणी, अंमृत बरसण लाग ।
बैणाँ पुणिगाँ वोसरी, भीगा ज्याँह सिरि भाग ॥
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पद ॥
*बाणी बरसै सबद सुहावै ॥*
कनरस भरि भरि हरिरस पीवै, हरि भगताँ नैं थावै ॥टेक॥
साध सीप संसार समंदा, तामैं लिपत न थावै । 
स्वाति बूंद सौं हरि रस बरसै, मन मोती होइ आवै ॥
रूँख बिरख बाबा की बाड़ी, केला भेला ठाँई । 
काया केलि मैं हरि रस बरसै, व्है कपूर ता मांहीं ॥ 
डूंगर हरिया सरवर भरिया, नीर निवाणाँ सरिया । 
फूली फली प्रत्थमी सगली, बाबै आनँद करिया 
दादुर मोर बबीहा बोलै, और जलचराँ जीवैं ।
बषनां बाणी हरि रस बरसै, साध सवाया पीवै ॥१३८॥
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परहित-निरत-संत-महात्मा सभी के लिये हितकारी अपरोक्षानुभूतियुक्त उपदेश देते हैं जो सभी सुनने वालों को प्रियकर लगता है । वे संत-महात्मा कानों को प्रिय लगने वाला हरि-गुण-रस स्वयं तो प्याले भर-भर कर पीते ही हैं हरिभक्तों को भी पिलाते हैं जो उन हरिभक्तों को भी प्रिय लगता है ।
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संसार रूपी समुद्र में साध-संत सीप के समान हैं जो संसार में रहते हुए भी संसार के भोगविलासों को ठीक वैसे ही नहीं भोगते हैं जैसे सीप समुद्र में रहकर भी समुद्र-जल का पान नहीं करके स्वाति नक्षत्र का जल ग्रहण करती है । जब हरिरस रूपी स्वाति नक्षत्र का जल बरसता है तब मन मोती हो जाता है । 
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बाबा = परमात्मा की संसार रूपी बाड़ी में केले के वृक्ष के साथ ही अनेकों प्रकार के पेड़ पौधे हैं । अर्थात् संसार में चौरासी लाख प्रकार की जीवा-जोनी साधु-संतों सहित रहती है । जब काया रूपी केले के वृक्ष में हरिरस रूपी वर्षा बरसती है तब वह कपूर में परिणित हो जाती है । 
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उस हरिरस रूपी वर्षा से डूंगर रूपी अहं का शुष्कत्व मिटकर शील, संतोष, क्षमा, दया आदि रूपी घास वृक्षादि से हरा भरा हो जाता है । हृदय रूपी सरोवर रामरस से लबालब भर जाता है । हरिरस रूपी जल, (निवाण = नीची जगह, तलहटी) सुरति रूपी निवाण में अथाह मात्रा में एकत्रित हो जाता है जो आवश्यकतानुसार हृदय रूपी सरोवर को जल से पूरित रखता है । 
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इस हरिरस रूपी वर्षा के जल से शरीर रूपी पूरी पृथिवी ही हरि भरी हो जाती है । वस्तुतः परमात्मा ने साधु-संतों के द्वारा हरिरस का वितरण कराकर आनंद करने का बंदोबस्त कर दिया है । उस हरिरस रूपी वर्षा के जल से कामी, क्रोधी, लोभी, दुराचारी रूपी दादुर, मोर, पपीहा और अनेक जलचर आनंदमग्न होकर हरि गुणों का गान करते हैं और आनंदपूर्वक जगत् में निवास करते हैं । 
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बषनां कहता है ब्रह्मनिष्ठ साधु-संतों की वाणी हरिरस रूपी जल की वर्षा करती है जिसको साधक साधु-संत पूरे उत्साह के साथ सवाया = अधिक से अधिक पीते हैं ॥१३८॥

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