शनिवार, 6 जून 2026

*१५. विरक्त् का अंग ~४१/४४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~४१/४४*
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*सुख वृक्ष संसार यहु, पंखि प्राण तज आश ।*
*रज्जब पत्र न फूल फल, त्रिविधि भांति सुख नाश ॥४१॥*
यह संसार सूखे वृक्ष के समान है, जैसे सूखे वृक्ष से पक्षी की पत्र, फूल और फल की आशा पूर्ण नहीं होती, वैसे ही संसार में प्राणी की मन, वचन और शरीर संबन्धी तीनों ही प्रकार की सुखाशा नष्ट होती है, पूर्ण नहीं होती । अत: सूखे वृक्ष से पक्षी को और संसार से प्राणी को सुख की आशा त्याग ही देना चाहिये ।

*मृतक को मूली१ नहीं, क्या फुके बिन आगि ।*
*रज्जब रीते भाव बिन, सो प्राणी दे त्यागि ॥४२॥*
मुर्दे की औषधि१ नहीं की जा सकती, अग्नि बिना जलाने का काम नहीं हो सकता है, ऐसे ही विरक्त को चाहिये, जिन प्राणियों में श्रद्धा-भाव नहीं होता उनका त्याग ही अच्छा है, कारण, उनका उद्धार तो होगा नहीं उलटा विरक्त के साधन में विध्न ही करेंगे ।

*रज्जब रीते प्राणि में, हेरि चढे क्या हाथ ।*
*वैद्य न करही वैद्यगी, मुये शरीरों साथ ॥४३॥*
जो श्रद्धा आदि से रहित है, उसे श्रेष्ठ बनाने का यत्न करे तो उसके क्या हाथ लगेगा ? अर्थात वह श्रेष्ठ नहीं बनता । वैद्य प्राण रहित शरीरों की चिकित्सा नहीं करता वैसे ही विरक्त श्रद्धा आदि से रहित का त्याग ही करते हैं ।

*रज्जब रीता आतमा, जे हिरदै हरि नाँहिं ।*
*तहाँ समागम को करे, सूने मंदिर माँहिं ॥४४॥*
जिसके हृदय में हरि चिन्तन नहीं होता, वह जीवात्मा खाली हृदय का माना जाता है । सूने घर में कोई जाय, तो वहाँ उससे कौन मिलेगा । अत: उक्त खाली हृदय का व्यक्ति और सूना घर दोनों ही त्याज्य हैं ।
(क्रमशः)

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