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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ३७/४०
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कै दुख अंतहकरण कौं, मन बुधि चित अहँकार ।
सुन्दर कै दुख त्रिगुन कौं, यह तुम कहौ बिचार ॥३७॥
या इसका अन्तःकरण, मन, बुद्धि या चित्त या अहङ्कार अथवा इसके ये त्रिगुण - सत्व, रज, तम - इन में इस दुःख का अनुभव करते हैं ? यह भी बताइये ॥३७॥
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कै दुख है महतत्व कौं, कै दुख प्रकृति हि मांनि ।
सुन्दर कै दुख पुरुष कौं, श्री गुरु कहौ बखांनि ॥३८॥
या यह दुःख यहाँ महत् तत्त्व को होता है ? या यह प्रकृति इसका अनुभव करती है ? या यह दुःख पुरुष अनुभव करता है ? इस विषय को विस्तृत रूप से मुझ को समझाइये ॥३८॥
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बहु बिधि देख्यौ सोच करि, कछु जान्यौ नहिं जाइ ।
सुन्दर यह दुख कौंन कौं, सद्गुरु कहि संमुझाइ ॥३९॥
हे गुरुदेव ! मैंने इस विषय पर बहुत चिन्तन मनन कर लिया, मुझे तो यह कुछ समझ में आया नहीं, अब आप ही इस विषय में मुझे मार्ग दिखावें ॥३९॥
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सुन्दर दुख नहिं देह कौं, इंद्रिनि कौं दुख नांहिं ।
दुख नहिं दीसै प्रान कौं, स्वास चलै तनु मांहिं ॥४०॥
उत्तर : श्रीगुरुदेव कहते हैं - हे जिज्ञासो ! यह दुःख न देह को होता है, न इन्द्रियों या प्राण को ही यह दुःख होता है; क्योंकि हम देखते हैं कि उस दुःख के समय भी प्राणी का श्वास चलता रहता है ॥४०॥
(क्रमशः)

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