रविवार, 7 जून 2026

मेरे लालन हो, दरसन द्यौ क्यूँ नांहीं

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू विरह वियोग न सहि सकूँ,*
*तन मन धरै न धीर ।*
*कोई कहो मेरे पीव को, मेटे मेरी पीर ॥*
================
विरह ॥
*मेरे लालन हो, दरसन द्यौ क्यूँ नांहीं ।* 
जैसे जल बिन मीन तलपै, यौं हूँ तेरे ताँई ॥टेक॥
बिन देख्यूँ तन तालाबेली, बिरहनि बारामासी ।
दिल मेरी का दरद पियारे, तुम मिलियाँ तैं जासी ॥
रैंणि निरासी होइ छमासी, तारा गिणत बिहासी ।
दिन बिरहनि कौ बाट तुम्हारी, सदा उडीकत जासी ॥
जल थल देखौं परबत पेखौं, बन बन फिरौं उदासी ।
बूझौं कोइ उहाँ तैं आया, ठावा मोहि बतासी ॥
फिरि फिरि सबै सयानें बूझे, हौं तो आस पियासी ।
बषनां कहै कहौ क्यूँ नांहीं, कब साहिब घर आसी ॥१४३॥
.
लालन = प्रियतम । तालाबेली = बैचेनी । उडीकत = राह देखते हुए । ठावा = यथार्थ स्थिति, प्रियतम का सही-सही समाचार । सयानें = शकुन बताने वाला सौंणी ॥ 
.
हे मेरे प्रियतम ! मुझे दर्शन क्यों नहीं देते हो । जिस प्रकार बिना जल के मीन तड़फती है वैसे ही तुम्हारे लिये मैं व्याकुल = बैचेन हूँ । मुझ विरहनी के तन-मन में बिना तुम्हारे दर्शन किये अहर्निश व्याकुलता = बैचेनी बनी रहती है । हे प्रियतम ! तुम्हारे अमिलन के कारण मेरे मन में उत्पन्न हुआ दर्द तुम्हारे मुझसे मिलने पर ही समाप्त होगा । 
.
बिना तुम्हारे आये और दर्शन दिये नैराश्यमयी एक रात्री छः माह की लम्बी अवधि के समान तारों को गिनते –गिनते ही व्यतीत होगी और मुझ विरहनी का दिन तुम्हारे आने की प्रतिक्षा व रास्ते को देखने में ही व्यतीत होगा । मैं तुम्हारे से मिलने के लिये तुमको जल में देखती हूँ (नदियों के किनारों पर देखती हूँ) स्थल पर देखती हूँ, पर्वतों पर तुमको ढूंढती हूँ तथा उदास हुई जंगल-जंजल ढूँढती फिरती हूँ । 
.
मैं उन लोगों से भी तुम्हारे समाचार पूछती हूँ जो तुम्हारे पास से आये हैं ताकि वे ही तुम्हारा यथार्थ समाचार मुझको बता दें । मैंने तुम्हारे आने के यथार्थ समय को बार-बार सौंणी लोगों से पूछा है क्योंकि मैं तो तुम्हारे आगमन की आशा की प्यासी हूँ । बषनां कहता है, हे प्रियतम ! तुम कहते क्यों नहीं हो कि तुम मेरे घर कब आओगे ॥१४३॥ 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें