बुधवार, 24 जून 2026

माया बादली रे

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*प्रेम भक्ति जब ऊपजै, निश्‍चल सहज समाधि ।*
*दादू पीवे राम रस, सतगुरु के प्रसाद ॥*
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राग धनाश्री ॥१९॥माया॥
माया बादली रे, तामैं हरि चंदा दीसै नाहिं ।
तिहि कारणि दुख पाइहै, कमोदनि जल माहिं ॥टेक॥
माया का बादल मिल्या, चंद छिप्या ता माहिं ।
मोह अंधारा व्है रह्या, ताथैं सूझै नाहिं ॥
ए बादल बहु भाँति का, पार न पावै कोइ ।
न बादल आघा खिसै, ना रैंणि उजाला होइ ॥
घात घटा बित ऊलटै, गाजै नित अहंकार ।
तन त्रिसना दिन की खिवै, यौं भीगा संसार ॥
रन मैं बन मैं घर महै, घूमि रही सब ठाँइ ।
बड़ा बड़ा गैंवर गल्या, माया का दौं माहिं ॥
ग्यान पवन जे संचरै, तौ बादल देइ उडाइ ।
बषनां कवल कमोदनी, बिगसै चंद तहाँ दिठि जाइ ॥१५९॥
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माया बादल = मेघ रूपा है । आकाश में = हृदय में माया के छा जाने पर परमात्मा रूपी चंद्रमा का दर्शन नहीं हो पाता है । इसी कारण संसार रूपी जल में कुमोदनी रूपी साधक = जीव दुख पाता है । माया रूपी बादलों के आपस में मिल जाने पर = माया का गहरा प्रभाव हो जाने पर परमात्मा रूपी चंद्रमा हृदय रूपी आकाश में छिप जाता है ।
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होता तो परमात्मा हृदयाकाश में ही है किन्तु मात्र छिप जाता है । ऊपर से मोह रूपी अधकार और अपना साम्राज्य जमा लेता है जिससे झूठ-सच कुछ भी सूझता = मालूम नहीं होता है । माया रूपी बादल अनेक प्रकार के हैं, धन-सम्पत्ति, बढ़ाई-मान, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, स्त्री, घर, दूकान, खेत, खलियान, पद, प्रतिष्ठा आदि आदि ।
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इनका पार कोई नहीं पा सकता । ये माया रूपी बादल आगे भी नहीं खिसकते हैं तो इनके कारण रात्री में उजाला भी नहीं होता है । अज्ञानावस्था में माया के कारण ज्ञान का प्रकाश भी नहीं हो पाता है । माया के कारण घात = हिंसा रूपी घटाएँ नित्य ही उमड़ती-घुमड़ती है । अहंकार रूपी गर्जना नित्य ही होती रहती है ।
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शरीर में त्रिष्ना रूपी बिजली दिन की = प्रतिदिन ही चमकती = प्रकट होती रहती है । इस प्रकार से सारा संसार ही इस माया रूपी बदली के प्रभाव रूपी जल से भीगता रहता है । यह माया रणसंग्राम में, जंगल में, घर में सभी जगहों पर अपना प्रभाव फैलाती फिरती है । इस माया रूपी अग्नि की लपटों में बड़े बड़े गैंवर = हाथी जैसे दिग्गज महान् व्यक्ति भी जलकर भस्म हो गये हैं ।
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यदि ज्ञान रूपी पवन का संचार हो जाये तो माया रूपी बादलों को वह उड़ा देता है जिससे साधक का हृदय रूपी कुमोदनी जहाँ भी चन्द्रमा रूपी परमात्मा होता है वही उसको दिठि = देखकर प्रफुल्लित हुई आनंद निमग्न हो जाती है ॥१५९॥

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