गुरुवार, 25 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३३/३६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३३/३६ 
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मुक्ति बतावत ब्योम परि, कहि धोखे के बैंन । 
सुन्दर अनुभव आतमा, उहै मुक्ति सुख चैंन ॥३३॥ 
यवनमत : कुछ मतवादी(सूफी दार्शनिक) सातवें आकाश(आसमान) में इस मुक्ति का स्थान बताते हैं । उन का भी यह कथन भ्रममात्र ही है; क्योंकि आत्मा का साक्षात्कार केवल शुद्ध हृदय में आत्मचिन्तन से ही हो पाता है । तभी साधक परम सुख एवं शान्ति का अनुभव कर पाता है ॥३३॥
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कोऊ मुक्ति शिला कहै, दूरि बतावत प्रोक्ष । 
सुन्दर अनुभव आतमा, यह ई कहिये मोक्ष ॥३४॥
कोई(जैनमतानुयायी) दार्शनिक दूरस्थ मुक्तिशिला को मुक्ति का वास्तविक स्थल बताते हैं । यह मत भी परोक्ष का ही ज्ञापन करता है; क्योंकि इस साधन(मत) से आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कहाँ हुआ । यह भवमुक्ति आत्मानुभव के विना अन्य किसी भी साधन से सम्भव नहीं है ॥३४॥
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सुन्दर साधन सब करैं, कहै मुक्ति हम जांहिं । 
आतम के अनुभव बिना, और मुक्ति कहुं नांहिं ॥३५॥ 
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस प्रकार वे सभी तथाकथित साधक भवमुक्ति के लिये पूर्ण प्रयास करते हैं; परन्तु आत्मानुभव के विना अपनी लक्ष्य-प्राप्ति में किसी को भी सफलता नहीं मिल पाती ॥३५॥
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सुन्दर मीठी बात सुनि, लागे करवा खांन । 
कष्ट करै बहु भांति के, तांतें अति अज्ञांन ॥३६॥
इन मतवादियों की बातें सुनने में तो बहुत मधुर लगती है; परन्तु व्यवहार में असफलता मिलने पर उन में कडुवापन(कटुता) आ जाता है । इस कष्टसाध्य साधना में असफल रहने पर इन का साधक अज्ञान में ही डूबा रह जाता है ॥३६॥
(क्रमशः)

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