शुक्रवार, 12 जून 2026

*१९. लै का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*१९. लै का अंग ~१/४*
इस अंग में वृत्ति लगाना रूप लय साधना का विचार कर रहे हैं -
.
*रज्जब ल्यौ मन लाँघिये, लाँबे लोक अनंत ।*
*आतम के अंतर उठे, कामिनि पावे कंत ॥१॥*
जब नारी की जीवात्मा में लय साधना उठता है, अर्थात वह अपने पति में वृत्ति लगाकर सती होती है तब लय मार्ग द्वारा बड़े बड़े अनन्त लोकों को लांघकर अपने पति को प्राप्त कर लेती है । वैसे ही साधक लय साधना द्वारा अनेक वासनामय लोकों को लांधकर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
.
*ल्यौ१ लाग्यों लहिये अलह, लौ१ में लूट अपार ।*
*रज्जब लौ लहिय लुक्या२, उर अन्य न आधार ॥२॥*
लय साधना द्वारा ईश्वर प्राप्त होता है, लय साधना में स्थिर होने पर अपार अध्यात्म धन लूटा जा सकता है । जो माया की आड़ में छिपा२ हुआ परब्रह्म है उसे लय साधना के द्वारा ही प्राप्त करो । हृदय अन्य साधना का आधार निरंतर नहीं बन सकता, ब्रह्माकार वृत्ति१ ही हृदय में निरंतर रह सकती है ।
.
*ल्यौ की लाठी मारतौं, मीच सु मारी जाय ।*
*रज्जब ल्यौ लाल हिं मिलै, लौ में काल न खाय ॥३॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप दंडा मारने से मृत्यु भी मारी जाती है, इस साधना के करने वाले प्रियतम ब्रह्म से मिलते हैं, ब्रह्म में वृत्ति होने के समय काल नष्ट नहीं करता, अर्थात समाधि में स्थित रहने में आयु क्षीण नहीं होती ।
.
*रज्जब लौ में लाभ है, लीन हुआ रहु माँहिं ।*
*लौ में लत१ लागे नहीं, और खता२ मिट जाँहिं ॥४॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाने से परमानन्द प्राप्ति रूप भारी लाभ है, अत: वृत्ति ब्रह्म में लीन करके ही रहना चाहिये । ब्रह्म में वृत्ति लगाने रूप साधन में स्थित रहने से कौई भी दुर्व्यसन१ नहीं लगता और काम क्रोधादि के द्वारा भी धोखा२ नहीं खाता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें