बुधवार, 10 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग ४८/५०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ४८/५०
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जाही कौं चितवन करैं, तैसौ ही ह्वै जाइ । 
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म हिं मांहि समाइ ॥४८॥
हे जिज्ञासु ! लोक में हम देखते हैं कि जो जैसा निरन्तर चिन्तन करता है वह वैसा ही बन जाता है । अतः यदि तुम भी ब्रह्म का सतत चिन्तन करोगे तो तुम ब्रह्मरूप हो जाओगे ॥४८॥ (ब्रह्मविद् ब्रहौव भवति) ।
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करत बिचार बिचारिया, एकै ब्रह्म बिचार । 
सुन्दर सकल बिचार मैं, यह बिचार निज सार ॥४९॥
जब किसी विचारवान् पुरुष ने निरन्तर विविध विचार करते हुए जब इस ब्रह्म के विषय में विवेकपूर्वक विचार किया तो उस के लिये वह विचार ही सर्वोपरि(सर्वोत्तम) हो जाता है; क्योंकि उसके द्वारा किये सभी विचारों में केवल इस ब्रह्मविचार में ही तत्त्व(सार) दृष्टिगोचर होता है ॥४९॥
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ब्रह्म बिचारत ब्रह्म ह्वै, और बिचारत और । 
सुन्दर जा मारग चलै, पहुंचै ताही ठौर ॥५०॥
इति बिचार कौ अंग ॥२६॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे जिज्ञासु ! यदि तुम निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन करोगे तो ब्रह्म रूप ही हो जाओगे । यदि अन्य पुत्र स्त्री धन आदि सांसारिक पदार्थों का चिन्तन करोगे तो तुमको वही उपलब्ध होंगी; क्योंकि हम लोक में यही देखते हैं कि जो जिस लक्ष्य की ओर जाने के मार्ग का अनुसरण करेगा, वह उसी लक्ष्य पर पहुँचेगा - यह निश्चित है ॥५०॥
इति विचार का अंग सम्पन्न ॥२६॥
(क्रमशः)

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