रविवार, 14 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग १३/१६ 
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देखत दीसै एक ही, अरथ बिचारय दोइ । 
सुन्दर अद्भुत बात है, संमुझै पंडित कोइ ॥१३॥
जैसे स्वरसहित व्यञ्जन सामान्य दृष्टि से एक ही दीखते हैं, परन्तु विचार करने पर व्यञ्जन स्वर का पृथक् विभाजन भी ज्ञात हो जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म समस्त जगत् में व्याप्त है, परन्तु विवेकशून्य पुरुष इसे अनुभव नहीं कर पाता । अतः विवेकी के लिये यही विवेक का फल है कि वह विवेक के आश्रयण से ब्रह्मज्ञानी हो पाता है ॥१३॥
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सोरठा
विंजन होइ तकार, तालिब होइ शकार जो । 
सुन्दर होइ छकार, उभय बरन नहिं देखिये ॥१४॥
ज्ञान के संस्कार का माहात्म्य : जैसे किसी शब्द में 'त्' के सम्मुख तालव्य 'श' हो तो वे दोनों मिल कर, व्याकरण शास्त्र के संस्कार के आधार पर, 'च्छ' हो जाते हैं । वहाँ पहले वाले 'त्' एवं 'श' दोनों व्यञ्जन नहीं दिखायी देते१ ॥१४॥ {१ द्र० - शश्छोऽटि (पा० सू० ८.४.६.३)}
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यौं द्विज सूद्र सु एक, ज्ञान बिषैं नहिं भेद है । 
उभय बरन तजि टेक, ब्रह्म रूप सुन्दर भये ॥१५॥
इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान से पूर्व ब्राह्मण एवं शूद्र जातियों में दिखायी देने वाला द्वैत भाव ब्रह्मज्ञान के बाद नहीं दिखायी देता । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - क्योंकि ब्रह्मज्ञान के बाद किसी भी प्रकार के द्वैत(जातिभेद) की कहीं कोई कल्पना ही नहीं रह जाती । तब समस्त संसार ब्रह्म की सुन्दरता में मग्न हो जाता है । यही संस्कार का माहात्म्य है ॥१५॥
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दोहा
दीरघ कै पीछे भये, ह्वै अनयास गुरुत्व । 
सुन्दर लघु दीरघ करै, ज्यौं अक्षर संयुत्व ॥१६॥
छन्दःशास्त्र के माध्यम से आत्मतत्त्वविवेक : अब श्रीसुन्दरदासजी छन्दः शास्त्र (काव्यशास्त्र) के अनुसार देवनागरी वर्णमाला के वर्णों के माध्यम से आत्मतत्त्व पर अपने विचार प्रस्तुत कर रहे हैं । छन्दःशास्त्र का यह सिद्धान्त२ है कि यदि काव्यपाठ में पठित किसी शब्द में कोई अनुस्वार () युक्त, दीर्घ या संयुक्त वर्ण हो, या विसर्ग (:) युक्त वर्ण हो तो उससे पूर्व का वर्ण दीर्घ(गुरु) माना जाता है । इसके अनुसार वे कहते हैं‌‍‍ - दीर्घ(अपने से बड़े) - का अनुगमन करने पर लघु(छोटे) को भी अनायास ही गुरुत्व(महत्त्व) प्राप्त हो जाता है । जैसे काव्यपाठ में कोई संयुक्त(मिले हुए) वर्ण, स्वयं लघु होते हुए भी, अपने से पीछे वाले वर्ण को गुरुत्व(महत्त्व) प्रदान कर देता है ॥१६॥ 
(२ सानुस्वारश्च दीर्घश्च, विसर्गी च गुरुर्भवेत् । 
वर्णः संयोगपूर्वश्च, तथा पादान्तगोऽपि वा ॥ - छन्दः शास्त्र ।)
(क्रमशः) 

 

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